बांग्लादेश से रातोरात आए इस कारोबारी ने कभी ढाई रुपए रोज़ पर बुनी साड़ियां, आज हर महीने 16 हज़ार साड़ियां बेचते हैं

जी सिंह Vol 1 Issue 2 फुलिया, पश्चिम बंगाल 10-Jan-2018

लगभग चार दशक बीत चुके हैं, लेकिन बीरेन कुमार बसक उन दिनों को कभी नहीं भूल सकते, जब वे साड़ियों के भारी-भरकम गट्ठर अपने कंधों पर उठाए ग्राहकों की तलाश में कोलकाता की गलियों में एक घर से दूसरे घर का दरवाज़ा खटखटाया करते थे. 

आज ज़िंदगी के 66 वर्ष पूरे कर चुके बीरेन साड़ियों की दुनिया के सफल उद्यमी बन चुके हैं. सालाना 50 करोड़ रुपए का कारोबार करने वाले बीरेन के ग्राहकों की सूची में देश के हर हिस्से के लोग शामिल हैं.

बीरेन कुमार बसक कभी कोलकाता में घर-घर जाकर साड़ियां बेचा करते थे. अब वो सफल उद्यमी हैं और हाथ से बुनी हुई साड़ियां बेचते हैं. उनके साथ 5 हज़ार बुनकर काम करते हैं. (फ़ोटो - मोनिरुल इस्लाम मुल्लिक)

अपने कारोबारी दिमाग़ व कड़ी मेहनत के बलबूते उन्होंने साल 1987 में महज आठ लोगों के साथ दुकान शुरू की, और क़दम-दर-क़दम आगे बढ़ते हुए सफल कारोबार खड़ा कर लिया. आज वो हर महीने देशभर में हाथ से बुनी गई 16 हज़ार साड़ियां बेचते हैं. उनके पास 24 कर्मचारी हैं और लगभग 5 हज़ार बुनकर उनके साथ काम करते हैं. 

इनके ग्राहकों की लंबी सूची में कई बेहद ख़ास नाम जुड़े हुए हैं. इनमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पूर्व क्रिकेटर सौरव गांगुली, जाने-माने शास्त्रीय संगीतकार उस्ताद अमजद अली खान, अभिनेत्री मौसमी चटर्जी समेत कई हस्तियां शामिल हैं.

जब मैं उनसे मिलने कोलकाता से लगभग 100 किमी दूर नाडिया जिले के फुलिया स्थित उनके घर पहुंचा, तो पहली मुलाक़ात से ही इनकी सादगी व विनम्रता का मुरीद हो गया. 

उन्हें देखकर बिल्कुल अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता कि उनके पास एक आलीशान बंगला है और कई महंगी गाड़ियों का काफ़िला है. इसके बावजूद बीरेन बेहद सुलझे क़िस्म के ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आए जिन्हें पैसों की ‘भूख’ नहीं, बल्कि आत्मसंतुष्टि है.

16 मई, 1951 को पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के टंगैल जिले में पैदा हुए बीरेन चार भाइयों व 2 बहनों में सबसे छोटे थे. उनका ताल्लुक बुनकरों के परिवार से है. उनके पिता बांको बिहारी बसक बुनकर होने के साथ-साथ कवि भी थे. 

बीरेन याद करते हैं, “पिताजी की आमदनी घर चलाने के लिए काफ़ी नहीं थी. कविताओं की हर प्रस्तुति के बदले उन्हें महज 10 रुपए मिलते थे. इतनी कम आमदनी में दो वक्त के भोजन की व्यवस्था कर पाना भी बेहद मुश्किल था. हालांकि क़िस्मत से हमारे पास क़रीब एक एकड़ खेती की ज़मीन थी, जिसकी पैदावार से हमारे खाने की ज़रूरतें पूरी होती थी.”

पत्नी बानी बीरेन को उनके कारोबार में पूरा सहयोग करती हैं.

उन्होंने टंगैल के शिबनाथ हाईस्कूल से कक्षा छठी तक पढ़ाई साल 1961 में पूरी की थी. बचपन की यादें ताज़ा करते हुए बीरेन बताते हैं, “मैं पढ़ाई के साथ-साथ एक स्थानीय पंडित से भजन सीखा करता था. जीवन के शुरुआती दिनों से भगवान के प्रति मेरा काफ़ी झुकाव रहा है. इससे मुझे चैन व सुकून मिलता था.”

साल 1962 में उनके क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने के कारण उनका परिवार टंगैल छोड़कर अपने कुछ रिश्तेदारों के पास फुलिया आकर बस गया. बीरेन कहते हैं, “उस समय दिन के वक्त बाहर निकलना सुरक्षित नहीं था, इसीलिए हम रात में सफ़र करते हुए वहां से निकले. परिवार के कुछ सदस्य हमसे पहले ही वहां पहुंच गए थे, जिसके बाद मैं, अपने माता-पिता व बड़े भाई के साथ वहां आया था.”

उन्हें अब भी याद है कि जब वे सीमा पार कर उत्तरी बंगाल में अलीपुरद्वार पहुंचे, तब उनके पिता के पास पैसे ख़त्म हो गए थे. 

बांग्लादेश में अपना सबकुछ पीछे छोड़कर चले आने के समय को याद करते हुए बीरेन बताते हैं, “मैंने सोने की एक चेन पहनी हुई थी, जिसे बेचकर पिताजी को हमारे खाने के लिए पैसों का इंतज़ाम करना पड़ा था. शहर आते समय सफ़र के दौरान टिकट ख़रीदने के पैसे न होने से हमने ट्रेन के फ़र्श पर बैठकर सफ़र किया था.”

पैसों की तंगी की वजह से वो अपनी पढ़ाई जारी नहीं कर पाए. फुलिया में बुनकरों की बहुतायत थी. इसलिए बीरेन ने भी एक स्थानीय इकाई में साड़ियों की बुनाई शुरू कर दी. इसके उन्हें ढाई रुपए रोज़ के हिसाब से पैसे मिला करते थे. घर चलाने में सहयोग करने के लिए अगले आठ साल तक उन्होंने उसी जगह काम किया.

बीरेन के बेटे अभिनब (27) भी अपने पिता के कारोबार से जुड़ने के लिए तैयार हैं.

साल 1970 में उन्होंने तय किया कि वो अब ख़ुद का कारोबार शुरू करेंगे. इसके लिए उन्होंने फुलिया में अपने भाई द्वारा साल 1968 में ख़रीदे गए एक मकान को 10 हज़ार रुपए में गिरवी रख दिया. 

इसके बाद उन्होंने अपने बड़े भाई धीरेन कुमार बसक के साथ साड़ियों का गट्ठर लादकर उन्हें बेचने के लिए कोलकाता शहर जाना शुरू कर दिया. बीरेन बताते हैं, “हम स्थानीय बुनकरों से साड़ियां ख़रीदते थे और उन्हें बेचने के लिए कोलकाता जाते थे.”

बीरेन कहते हैं, “हम रोज़ तड़के पांच बजे लोकल ट्रेन पकड़कर कोलकाता के लिए निकलते और क़रीब 80-90 किग्रा वज़न अपने कंधों पर उठाकर साड़ियां बेचने घर-घर जाते थे. सामान्यतः हम कई किलोमीटर ऐसे ही भटकने के बाद देर रात घर लौटते और अगली सुबह फिर जल्दी निकल जाते थे.”

इतनी कड़ी मेहनत का फल भी इन्हें मिलने लगा. साड़ियों की अच्छी गुणवत्ता व कम दाम के चलते कई लोग उनके ग्राहक बन गए. 

वे कहते हैं, “हमारे ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी और हमें साड़ियों के अच्छे ऑर्डर मिलने लगे. इस कारोबार में हमें फ़ायदा होने लगा.” साल 1978 तक दोनों भाई मिलकर लगभग 50 हज़ार रुपए प्रतिमाह कमाने लगे.

साल 1981 में दोनों भाइयों ने मिलकर दक्षिण कोलकाता में 1300 वर्ग फ़ीट की जगह क़रीब पांच लाख रुपए में ख़रीद ली. साल 1985 में उसी जगह पर उन्होंने धीरेन ऐंड बीरेन बसक एंड कंपनी नाम से दुकान खोली. यहां से वो साड़ियां बेचने लगे. अगले एक साल में उनकी दुकान का कारोबार 1 करोड़ रुपए पहुंच चुका था.

वित्तीय सफलता से बीरेन के पास समृद्धि भी आई, लेकिन उनके पैर अब भी मज़बूती से ज़मीन पर टिके हैं.

हालांकि जल्द ही दोनों भाइयों ने अलग होने का फै़सला किया और साल 1987 में बीरेन फुलिया लौट आए. बीरेन बताते हैं, “मेरे पास बचत के तौर पर 70-80 लाख रुपए थे. मुझे ग्रामीण जीवन पसंद था, इसलिए अपने गांव चला आया था, कोलकाता तो मैं सिर्फ़ रोज़ी-रोटी कमाने गया था. अपने भाई के साथ साझेदारी ख़त्म करने के बाद मैंने अपनी जड़ों की तरफ़ लौटने का फै़सला किया.”

सिर्फ़ पैसों के पीछे न भागते हुए वो भक्तिपूर्ण गानों के प्रति अपने लगाव को भी आगे बढ़ाना चाहते थे. वे मुस्कुराते हुए कहते हैं, “धार्मिक मानसिकता वाले लोगों को पैसों का लालच नहीं होना चाहिए.”

बीरेन हमेशा से ही रचनात्मक दिमाग़ के रहे हैं और उन्हें साड़ियां डिज़ाइन करना बहुत पसंद था, इसीलिए उन्होंने साड़ी का थोक विक्रेता बनने का फै़सला लिया. साल 1987 में वापस आने के तुरंत बाद उन्होंने आठ कर्मचारियों के साथ अपने घर में बीरेन बसक एंड कंपनी नामक साड़ियों की दुकान खोली. 

बीरेन बताते हैं, “हमने क़रीब 800 बुनकरों के साथ अपने काम की शुरुआत की, जिन्हें हम साड़ियों के ऑर्डर दिया करते थे. बाज़ार में कई वितरकों से मेरी अच्छी पहचान थी. मैंने उन्हें अपने नए कारोबार की जानकारी दे दी. मेरा कारोबार बढ़ने के साथ ही कोलकाता स्थित मेरे भाई की दुकान की बिक्री में गिरावट आ गई, क्योंकि मैं अधिक रचनात्मक था और लोग मेरी डिज़ाइन की गई साड़ियां ख़रीदना अधिक पसंद करने लगे.

साल 2016-17 में इनकी कंपनी का सालाना कारोबार 50 करोड़ रुपए हो गया, परंतु इन्हें आज भी अपने धंधे का पहला दिन याद है जब इन्होंने अपनी पहली साड़ी 60 रुपए में बेची थी. 

बीरेन ने साल 1977 में शादी की और तभी से इनकी पत्नी बानी हमेशा इनके सुख-दुःख में साथ खड़ी रही हैं. उनका एक पुत्र भी है अभिनब (27), जो अपने पिता के कारोबार में जल्द ही शामिल होगा.

बीरेन अपनी सफलता का श्रेय काम के प्रति समर्पण, ईमानदारी और भगवान पर भरोसे को देते हैं.

बीरेन कहते हैं, “मैंने अब तक बेटे को अपना कारोबार संभालने की इजाज़त नहीं दी और वह धागों का छोटा-मोटा कारोबार करता है. इसके पीछे मुख्य मकसद उसे यह सिखाना है कि ज़िंदगी में पैसा कमाना कितना मुश्किल है. पैसों की क़द्र समझने के बाद ही वह मेरे कारोबार में शामिल होगा, इसके बाद ही वह सफलता की उम्मीद कर सकता है.”

साड़ियों के इस कारोबारी को अब तक कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है, जिसमें साल 2013 में केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय द्वारा दिया गया प्रतिष्ठित संत कबीर पुरस्कार भी शामिल है. बीरेन कड़ी मेहनत व निष्ठा से अधिक अपनी कामयाबी का श्रेय परमेश्वर को देते हैं और आज भी उनकी ज़िंदगी अध्यात्म के इर्द-गिर्द ही घूमती है. 

उभरते हुए उद्यमियों को सीख देते हुए वो कहते हैं, ईमानदारी व निष्ठा के साथ काम करो और भगवान पर भरोसा रखो. इससे भी महत्वपूर्ण, अमीर बनने पर कभी अभिमान मत करो.

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  • Thursday, October 18, 2018