Milky Mist

Tuesday, 16 April 2024

22 साल की उम्र में उद्यम असफल रहा, लाखों का नुकसान हुआ तो भी हार नहीं मानी, छह साल बाद ऑर्गेनिक खेती से फिर शुरुआत की, तीन साल में टर्नओवर 1 करोड़ रुपए पहुंचा

16-Apr-2024 By उषा प्रसाद
चेन्नई

Posted 01 Jul 2021

अर्चना स्टालिन जन्मजात योद्धा हैं. 22 साल की युवावस्था में अपने पहले उद्यम में असफल होने के बाद कई लोगों ने अपने कारोबारी सपनों को दफन कर दिया होगा, लेकिन अर्चना उन लोगों में से नहीं थीं. उन्होंने अनुभव को व्यावहारिक एमबीए माना, सबक सीखे और दूसरा उद्यम शुरू किया.

उन्होंने अपना पहला व्यवसाय बंद करने के करीब छह साल बाद माईहार्वेस्ट फार्म्स (myHarvest Farms) कंपनी शुरू की. यह कंपनी चेन्नई में 800 से अधिक ग्राहकों को ताजा, ऑर्गेनिक उत्पाद डिलीवर करती है.

अर्चना स्टालिन ने अपने पति स्टालिन कालिदाॅस के साथ मिलकर 2018 में माईहार्वेस्ट फार्म्स की शुरुआत की थी. (फोटो: विशेष व्यवस्था से)


इस बार वे सफलता के फॉर्मूले को तोड़ती नजर आती हैं. टेरेस गार्डन के साथ छोटी शुरुआत करते हुए उन्होंने और उनके पति ने 2018 में दो एकड़ का एक खेत लीज पर लिया. यह जगह चेन्नई से करीब 40 किलोमीटर दूर तिरुवल्लूर जिले के सेम्बेडु गांव में थी.

उन्होंने इसका नाम वेम्बू फार्म्स रखा. यह ऑर्गेनिक किसानों और ग्राहकों के समुदाय के रूप में विकसित हुआ.

पहले साल (2018-19) में कंपनी का टर्नओवर 8 लाख रुपए रहा. दूसरे साल यह बढ़कर 44 लाख रुपए हो गया. पिछले वर्ष के दौरान यह एक करोड़ रुपए तक पहुंच गया.

अर्चना कहती हैं, “अगले तीन सालों में हम 10,000 परिवारों तक पहुंचने और 500 से ज्यादा किसानों के साथ काम करने के बारे में सोच रहे हैं.”

22 साल की उम्र में अपना पहला उद्यम शुरू करने से पहले ही, अर्चना अपने जीवन में एक बड़ा फैसला ले चुकी थीं.

अर्चना ने कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, गिंडी (चेन्नई) से जियोइनफॉरमैटिक्स में स्नातक की डिग्री लेने के तुरंत बाद अपने कॉलेज के सहपाठी स्टालिन कालिदाॅस से शादी कर ली. उस वक्त वे महज 21 साल की थीं और परिवार वाले इस शादी के खिलाफ थे.

अर्चना कहती हैं, “मेरी शादी मेरे जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ थी. मेरे परिवार के सभी लोगों ने (विस्तारित) परिवार में ही शादी की थी. मैंने वह जंजीर तोड़ दी थी और परिवार के सदस्यों के विरोध के बावजूद स्टालिन से शादी की.”
अर्चना अपने खेतों की उपज के साथ.

तीन साल बाद जनवरी 2012 में, दोनों ने मिलकर दक्षिण तमिलनाडु में स्टालिन के गृहनगर विरुधनगर में एक भू-स्थानिक कंपनी जियोवर्ज की स्थापना की.

उन्होंने इस कारोबार में करीब 10 लाख रुपए का निवेश किया. अपनी बचत से पैसा लगाया और दोस्तों व परिवार के सदस्यों से भी उधार लिया. अर्चना बताती हैं, “जब हमने दो साल के भीतर यह कंपनी बंद की तो सबकुछ खत्म हो गया.”

“पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि हमें शुरू करने से पहले कुछ और शोध व बाजार का विश्लेषण करना चाहिए था. वह बहुत बड़ी सीख थी. हालांकि हम इतने परिपक्व हो चुके थे कि यह समझ सकें कि विचार विफल होते हैं, लेकिन प्रयास नहीं होते हैं.”

कुछ सालों तक अर्चना ने अलग-अलग जगहों पर काम किया. इसके बाद 2018 में अपने पति के साथ उद्यमिता में फिर से एक और हाथ आजमाने को तैयार हो गई.

वे 2013 में मदुरै में नेटिवलीड फाउंडेशन से जुड़ीं और संगठन की हेड ऑफ प्रोग्राम्स बन गईं. यह एक संगठन है, जो तमिलनाडु के टियर II और टियर III शहरों में उद्यमिता को बढ़ावा देता है.

उसी साल अर्चना जागृति यात्रा पर गईं. इसमें 20-27 उम्र के लोग 15 दिन के लिए ट्रेन यात्रा पर जाते हैं और विभिन्न भारतीय राज्यों में 12 स्थानों पर अपने 15 रोल मॉडल से मिलते हैं.

अर्चना कहती हैं, “मैं उन लोगों से मिली, जिनके बारे में मैंने यात्रा के दौरान बहुत कुछ पढ़ा था. इससे मेरे विचारों में एक नया अध्याय जुड़ा. अब मैं एक सामाजिक उद्यम बनाना चाहती थी.”

अर्चना ने 2015 में नेटिवलीड को छोड़ दिया और चेन्नई में नेचुरल्स सैलून में स्ट्रैटेजिक मार्केटिंग के प्रमुख के रूप में जुड़ गईं. उधर, विरुधनगर में स्टालिन किचन गार्डनिंग में करने लगे थे.

करीब डेढ़ साल बाद 2016 में नेचुरल्स को छोड़ दिया. अब वे अपनी रुचि का काम यानी ऑर्गेनिक खेती करना चाहती थीं. इस क्षेत्र में अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए उन्होंने ऑर्गेनिक खेती करने वाले किसानों और टैरेस गार्डनिंग के विशेषज्ञों से मुलाकात की.
अपने पति और सह-संस्थापक स्टालिन के साथ अर्चना.

नवंबर 2016 में अर्चना और स्टालिन ने माईहार्वेस्ट की स्थापना की. शुरुआत में उन्होंने शहरी क्षेत्रों में बालकनियों में या छतों पर लोगों को अपनी खुद की भाजी और सब्जियां उगाने में मदद की.

माईहार्वेस्ट ने स्कूलों के साथ भी काम किया. स्कूल गार्डन बनाकर बागवानी में व्यावहारिक शिक्षा देने में मदद की. उन्होंने ऐसे गिफ्ट बॉक्स भी बेचे, जिनमें एक बर्तन, मिट्टी और बीज होते थे.

अर्चना कहती हैं, “छत पर बागवानी अच्छी थी, लेकिन हमने महसूस किया कि इसकी अपनी सीमाएं हैं. तब हमें लगा कि अगर हम बड़े क्षेत्र में ऑर्गेनिक खेती करें, तो हम लोगों को रसायन मुक्त, स्वस्थ, ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों की आपूर्ति कर सकते हैं.”

इसके बाद दोनों ने तिरुवल्लुर जिले में 25,000 रुपए सालाना शुल्क पर दो एकड़ जमीन लीज पर ली और माईहार्वेस्ट फार्म्स को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में शामिल किया.

पहले साल दोनों ने ऑर्गेनिक सब्जियां उगाईं और उन्हें चेन्नई की पांच ऑर्गेनिक दुकानों तक भेजा.

वे बताती हैं, “इस एक साल में हमें बहुत जानकारी मिली. किसान के रूप में, फसल उगाने, बेचने और भंडारण तक सब कुछ एक चुनौती था.”

लगभग छह महीने के मंथन और रणनीति के बाद उन्होंने किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को शामिल करते हुए एक समुदाय बनाने का फैसला किया.
अर्चना के साथ टीम माईहार्वेस्ट फार्म्स.

वेम्बू फार्म पहला खेवनहार बना और उन्होंने चेन्नई के 18 परिवारों के साथ सब्सक्रिप्शन मॉडल पर शुरुआत की.

हर परिवार ने 3,000 प्रति माह के रूप में तीन महीने का सदस्यता शुल्क दिया. इससे उन्हें संचालन के लिए जरूरी पूंजी मिल गई. पहली फसल छह सप्ताह के बाद डिलीवर कर दी गई.

हर हफ्ते सब्सक्राइबर यानी ग्राहकों को लगभग 10 किलोग्राम सब्जियां दी जाती थीं. इसमें सब्जियों की 8 से 10 किस्में होती थीं. इनमें दो से तीन गुच्छे भाजी के और देसी चिकन के अंडे होते थे.

अर्चना शुरुआत में सभी परिवारों को खुद सब्जियां देने जाती थीं. वे कहती हैं, “18 परिवार फॉर्म पर आए और बीज बोए. उन्होंने उन सारी सब्जियों के बारे में पूरी जानकारी ली, जो वहां उगाई जाने वाली थीं.”

वे कहती हैं, “इन परिवारों में हमारे परिचित और अनजान लोग शामिल थे. उनसे मुझे हमारे ऑर्गेनिक उत्पादों के बारे में सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली.”

अधिकांश सब्जियां वेम्बु फार्म में उगाई जाती थीं, जबकि गाजर और कुछ अन्य सब्जियां ऊटी के एक खेत से खरीदी जाती थीं.

अर्चना कहती हैं, “हमें जो सबक मिला, वह यह था कि हम एक खेत में सबकुछ नहीं उगा सकते हैं. और हमें राज्यभर के किसानों के साथ गठजोड़ करने की जरूरत है. चूंकि हमारे पास पहले दिन से अग्रिम भुगतान कर चुके ग्राहक थे, इसलिए हमने एक-एक करके फार्म्स को जोड़ा.”


अर्चना ऑर्गेनिक फार्मिंग पर अपनी जानकारी को विभिन्न मंचों पर साझा करती हैं.

अर्चना कहती हैं, “हमें इस बात पर गर्व है कि हमारे किसान युवा हैं. जींस पहनते हैं 26 से 27 आयुवर्ग के हैं. वे अपनी जमीन को नया जीवन देना चाहते हैं. पहले साल में, हमने इसे धीमी गति से किया क्योंकि हम मजबूत मॉडल स्थापित करना चाहते थे.”

कोविड महामारी के पहले तक वे 200 परिवारों को 60 किस्मों की सब्जियां और फल पहुंचा रहे थे.

कोविड महामारी के बाद माई हार्वेस्ट फार्म्स की टीम रातोरात योद्धा बन गई.

अर्चना कहती हैं, “हमने देखा कि हर ई-कॉमर्स प्लेयर की आपूर्ति शृंखला चरमरा गई थी, लेकिन हमारे पास स्थानीय, ताजा, ऑर्गेनिक वाला मॉडल था और हम अपना बिजनेस करने में सफल रहे.”

“एक भी ऐसा सप्ताह नहीं गया, जब हमने अपने ग्राहकों को सब्जियां नहीं पहुंचाईं. इस तरह हमने उनका विश्वास जीता. प्राकृतिक रूप से उगाई जाने वाली सब्जियां चाहने वाले और परिवार इकट्‌ठे हो चुके थे. एक तरह से, महामारी हमारे लिए वरदान बनी. हमारी टीम तेजी से आगे बढ़ी है.”

अप्रैल 2020 से, उन्होंने अपने डिलीवरी मॉडल को सब्सक्रिप्शन से ऑर्डर-आधारित, कैश-ऑन-डिलीवरी मॉडल में बदल दिया है.

“शुरुआत में, हमें ऑर्डर-आधारित मॉडल को लेकर संदेह था क्योंकि यह भी सुनिश्चित नहीं था कि लोग फिर से ऑर्डर देंगे. सौभाग्य से, लोगों ने दोबारा ऑर्डर दिए.”

माईहार्वेस्ट फार्म्स स्वस्थ, हरी भाजी सहित कई तरह के ऑर्गेनिक उत्पादों की आपूर्ति करता है. 

“प्रति ग्राहक लगभग 1,000 रुपए के औसत से हमने देखा कि परिवार सब्जियों के अलावा अन्य चीजें जैसे तेल, चावल, बाजरा-आधारित स्नैक्स की भी मांग करते हैं. हमने ये चीजें भी डिलीवर करनी शुरू कर दी हैं.”

जब उनके ग्राहकों की संख्या 200 तक पहुंच गई, तो अर्चना ने वेम्बू फार्म पर एक पार्टी आयोजित की. इसमें किसानों और ग्राहकों ने एक-दूसरे से मुलाकात की. इसमें करीब 89 परिवार शामिल हुए.

उनके अधिकांश ग्राहक रविवार को परिवारों के साथ माईहार्वेस्ट के विभिन्न फार्म आते हैं.

वे पूरा दिन खेतों में घूमते हुए बिताते हैं, यह देखते हैं कि किसान अपनी खाद कैसे बनाते हैं, अपने बच्चों को दिखाते हैं कि कैसे खेती की जाती है, पंप सेट के नीचे नहाते हैं. बैलगाड़ी की सवारी का आनंद भी लेते हैं.

अर्चना कहती हैं, “यही वह समुदाय है जो मैं बनाना चाहती हूं. हम लोगों को प्रकृति के करीब, अच्छे खाद्य पदार्थ के करीब लाना चाहते हैं. खासकर हम एक स्वस्थ समुदाय का निर्माण करना चाहते हैं.”


 

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

  • Miyazaki Mango story

    ये 'आम' आम नहीं, खास हैं

    जबलपुर के संकल्प उसे फरिश्ते को कभी नहीं भूलते, जिसने उन्हें ट्रेन में दुनिया के सबसे महंगे मियाजाकी आम के पौधे दिए थे. अपने खेत में इनके समेत कई प्रकार के हाइब्रिड फलों की फसल लेकर संकल्प दुनियाभर में मशहूर हो गए हैं. जापान में 2.5 लाख रुपए प्रति किलो में बिकने वाले आमों को संकल्प इतना आम बना देना चाहते हैं कि भारत में ये 2 हजार रुपए किलो में बिकने लगें. आम से जुड़े इस खास संघर्ष की कहानी बता रही हैं सोफिया दानिश खान
  • Ready to eat Snacks

    स्नैक्स किंग

    नागपुर के मनीष खुंगर युवावस्था में मूंगफली चिक्की बार की उत्पादन ईकाई लगाना चाहते थे, लेकिन जब उन्होंने रिसर्च की तो कॉर्न स्टिक स्नैक्स उन्हें बेहतर लगे. यहीं से उन्हें नए बिजनेस की राह मिली. वे रॉयल स्टार स्नैक्स कंपनी के जरिए कई स्नैक्स का उत्पादन करने लगे. इसके बाद उन्होंने पीछे पलट कर नहीं देखा. पफ स्नैक्स, पास्ता, रेडी-टू-फ्राई 3डी स्नैक्स, पास्ता, कॉर्न पफ, भागर पफ्स, रागी पफ्स जैसे कई स्नैक्स देशभर में बेचते हैं. मनीष का धैर्य और दृढ़ संकल्प की संघर्ष भरी कहानी बता रही हैं सोफिया दानिश खान
  • Prakash Goduka story

    ज्यूस से बने बिजनेस किंग

    कॉलेज की पढ़ाई के साथ प्रकाश गोडुका ने चाय के स्टॉल वालों को चाय पत्ती बेचकर परिवार की आर्थिक मदद की. बाद में लीची ज्यूस स्टाॅल से ज्यूस की यूनिट शुरू करने का आइडिया आया और यह बिजनेस सफल रहा. आज परिवार फ्रेश ज्यूस, स्नैक्स, सॉस, अचार और जैम के बिजनेस में है. साझा टर्नओवर 75 करोड़ रुपए है. बता रहे हैं गुरविंदर सिंह...
  • how a boy from a village became a construction tycoon

    कॉन्ट्रैक्टर बना करोड़पति

    अंकुश असाबे का जन्म किसान परिवार में हुआ. किसी तरह उन्हें मुंबई में एक कॉन्ट्रैक्टर के साथ नौकरी मिली, लेकिन उनके सपने बड़े थे और उनमें जोखिम लेने की हिम्मत थी. उन्होंने पुणे में काम शुरू किया और आज वो 250 करोड़ रुपए टर्नओवर वाली कंपनी के मालिक हैं. पुणे से अन्वी मेहता की रिपोर्ट.
  • Success Story of Gunwant Singh Mongia

    टीएमटी सरियों का बादशाह

    मोंगिया स्टील लिमिटेड के मालिक गुणवंत सिंह की जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उनका सिर्फ एक ही फलसफा रहा-‘कभी उम्मीद मत छोड़ो. विश्वास करो कि आप कर सकते हो.’ इसी सोच के बलबूते उन्‍होंने अपनी कंपनी का टर्नओवर 350 करोड़ रुपए तक पहुंचा दिया है.