Milky Mist

Saturday, 29 January 2022

उत्तर प्रदेश के बरेली के कारोबारी ने 10 लाख रुपए निवेश कर 2,500 करोड़ रुपए टर्नओवर वाला एफएमसीजी ब्रांड बनाया

29-Jan-2022 By सोफिया दानिश खान
बरेली

Posted 21 Jul 2021

उत्तर प्रदेश का बरेली 80 के दशक में छोटा शहर हुआ करता था. ऐसे छोटे शहर से 2,500 करोड़ रुपए टर्नओवर वाला एफएमसीजी ब्रांड खड़ा करना आसान नहीं है. इसके लिए दूरदर्शी और तेज, चतुर कारोबारी दिमाग की जरूरत होती है.

घनश्याम खंडेलवाल ने 1985 में अपने भाई के साथ 10 लाख रुपए से साझेदारी फर्म के रूप में कारोबार शुरू किया. कंपनी पैकेज्ड सरसों का तेल बैल कोल्हू के ब्रांड से बेचती थी. उस वक्त घनश्याम की उम्र महज 29 साल थी.

बीएल एग्रो के एमडी घनश्याम खंडेलवाल ने 1986 में 10 लाख रुपए के निवेश से सरसों तेल की इकाई शुरू की थी. (फोटो: विशेष व्यवस्था से)

कंपनी ने पहले साल 80 लाख रुपए का कारोबार किया. इसके बाद बिजनेस साल दर साल बढ़ता गया. 1998 में कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनी और अंतत: 2007 में सार्वजनिक क्षेत्र में आ गई.

साल 2000 में, कंपनी ने 100 करोड़ रुपए के कारोबार का आंकड़ा पार किया और 2010 में 1,000 रुपए के सालाना टर्नओवर को छू लिया.

2018 में कंपनी ने नरिश ब्रांड नाम से फूड प्रोडक्ट्स की विस्तृत शृंखला लॉन्च की. कंपनी अब तक करीब 12 नरिश एक्सक्लूसिव ब्रांड आउटलेट खोल चुकी है. ऐसे ही और अधिक आउटलेट खोलने का लक्ष्य रखा है.

विज्ञान विषय से ग्रैजुएट घनश्याम ऐसे परिवार से ताल्लुक रखते हैं, जो द्वितीय विश्व युद्ध के समय से सरसों के तेल के कारोबार में हैं.

बीएल एग्रो लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर 64 वर्षीय घनश्याम कहते हैं, “मेरे दादाजी ने बिजनेस शुरू किया था, जो उनके बाद मेरे पिता और उनके भाई ने जारी रखा.”

घनश्याम पांच बहनों और दो भाइयों के साथ बड़े हुए. उन्होंने नैनीताल के बिड़ला विद्या मंदिर में कक्षा छह से आठ तक पढ़ाई की. बाद में इटावा (प्रतापगढ़) के केपी इंटर कॉलेज में कक्षा 9 और 10 की पढ़ाई की.

घनश्याम कहते हैं, “मैंने बरेली के विष्णु इंटर कॉलेज से 12वीं की पढ़ाई पूरी की. फिर बरेली कॉलेज से बीएससी (सामान्य) की पढ़ाई की. मैं पढ़ाई में इतना भी अच्छा नहीं था, लेकिन कक्षा 10 और 12 प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की थी.”
बीएल एग्रो में अपने बेटे और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर आशीष के साथ घनश्याम खंडेलवाल.

“1975 में मैं कॉलेज के अंतिम वर्ष में था. उस समय भारत में आपातकाल लगा. मेरी बहन और उनके पति दोनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था. वे दोनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे.

“इसलिए मैं उनके शहर प्रतापगढ़ चला गया. वहां मैंने करीब छह महीने तक उनके होजरी के बिजनेस जय भारत जनरल स्टोर को संभाला. यह किसी तरह के बिजनेस से मेरा पहला सामना था.”

उनकी जेल से रिहाई के बाद घनश्याम घर लौट आए और ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी की.

इसके तुरंत बाद, उन्हें लालता प्रसाद किशनलाल केमिस्ट शॉप संभालनी पड़ी. यह उनके पिता और चाचा द्वारा शुरू किया एक अन्य पारिवारिक बिजनेस था.

वे कहते हैं, “मेरे पिता अस्वस्थ हो गए थे. ऐसे में दुकान मुझे ही संभालनी पड़ी.”

चूंकि परिवार के सरसों के तेल का बिजनेस विज्ञान में उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ था, इसलिए उसमें उनकी ज्यादा रुचि रही.

वे कहते हैं, “मेरा परिवार चाहता था कि मैं एक सरकारी नौकरी की तलाश करूं, जबकि मेरा दिल पारिवारिक बिजनेस में लग गया था.”

“मैंने तेल बिजनेस का बारीकी से अध्ययन करना शुरू किया और पाया कि मिलावट की शिकायतों के कारण इस बिजनेस की अच्छी प्रतिष्ठा नहीं थी.”

उन्होंने तेल की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले खास-खास मुद्दों की पहचान की और पाया कि गुणवत्ता सरसों के बीज में गोंद (फॉस्फोलिपिड्स) की संरचना पर निर्भर करती है. इसलिए जब उन्होंने 1986 में खुद की कंपनी शुरू की तो कोल्ड प्रेस्ड तेल लॉन्च किया.

वे समझाते हैं, “कोल्ड प्रेस्ड तेल में गोंद सामग्री को अलग किया जा सकता है और तेल की गुणवत्ता को नियंत्रित किया जा सकता है.”

घनश्याम के पिता का 1981 में निधन हो गया. 1985 में उनके पिता के भाई ने पारिवारिक बिजनेस संभाल लिया और उन्हें अपने हिस्से के रूप में 10 लाख रुपए दिए.

घनश्याम की बेटी ऋचा खंडेलवाल बीएल एग्रो की ब्रांड प्रवक्ता हैं.

अपने छोटे भाई दिलीप के साथ बिजनेस शुरू करने वाले घनश्याम कहते हैं, “मैंने उस पैसे से 1986 में बैल कोल्हू की शुरुआत की. 1990 में कंपनी ने एगमार्क के लिए पंजीकरण कराया, जो उन दिनों भी गुणवत्तापूर्ण उत्पादों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता था.

1998 में, कंपनी को संकट का सामना करना पड़ा, जब सरकार ने एक अफवाह फैलने के बाद सरसों के तेल पर प्रतिबंध लगा दिया. अफवाह थी कि यह उत्पाद लोगों में जलोदर (ड्रॉप्सी) का कारण बन रहा है.

घनश्याम बताते हैं, “मैंने कई अखबारों में विज्ञापन दिया कि सरसों का तेल हानिकारक नहीं है. और हमारी बिक्री बढ़ने लगी. यही वह समय था जब मुझे उत्तर प्रदेश के ऑइल किंग के रूप में जाना जाने लगा.”

घनश्याम के मुताबिक, कंपनी 1991 से तेल की शुद्धता जांचने के लिए गैस क्रोमैटोग्राफी प्रक्रिया का उपयोग कर रही है और सरकार ने इसे इस साल से अनिवार्य किया है.

उनका यह भी दावा है कि उत्तर प्रदेश में बोतलबंद सरसों तेल पेश करने वाली पहली कंपनी थी. वे कहते हैं, “हमने सेमी ऑटोमैटिक पैकेजिंग मशीनों का इस्तेमाल किया. उसे मैंने अपनी सिंगापुर यात्रा के दौरान देखा था.

घनश्याम हंसते हुए कहते हैं, “2002 में सरकार ने खुले तेल की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था, हालांकि यह 2009 में ही प्रभावी हुआ. इसलिए मैं विनम्रतापूर्वक मानता हूं कि हम हमेशा अपने समय से आगे थे.”

घनश्याम कहते हैं कि यूरोप की अपनी एक यात्रा के दौरान उन्होंने कुछ प्रकार के मिश्रित तेल देखे थे जिन्हें मिलाकर बेचा जा रहा था. हालांकि भारत में इसे मिलावट के रूप में माना जाता था.

फैक्ट्री में बैल कोल्हू सरसों तेल की पैक बोतलें.   

इस पारंपरिक कारोबार में नई तकनीक पेश करने में अग्रणी रहे घनश्याम बताते हैं, “जब मैं भारत लौटा, तो मैंने मिश्रित तेल बनाने की अनुमति के लिए हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की. हम केस जीत गए और हमारी कंपनी भारत में मिश्रित तेल के लिए लाइसेंस हासिल करने वाली पहली कंपनी बन गई.”

1990 से 2003 तक उनकी फैक्ट्री बरेली के माधव वाड़ी औद्योगिक क्षेत्र में रही. बाद में वे इसे परसा खेड़ा औद्योगिक क्षेत्र ले आए.

2006 में, उन्होंने परसा खेड़ा में रोजाना 50 टन की पैकेजिंग क्षमता वाली पहली रिफाइनरी लगाई. अब इस इकाई की क्षमता बढ़कर 550 टन प्रतिदिन हो गई है.

2011 में 250 टन तेल प्रतिदिन की पैकेजिंग क्षमता के साथ जौहरपुर औद्योगिक क्षेत्र में एक और फैक्ट्री लगाई गई.

कंपनी ने 2015 में पूरी तरह स्वचालित एक और संयंत्र लगाया. इसने कुल शोधन क्षमता को बढ़ाकर 600 टन प्रतिदिन और पैकेजिंग क्षमता को 1100 टन प्रतिदिन कर दिया.

घनश्याम ने 1977 में रागिनी से शादी की. उनके 43 वर्षीय पुत्र आशीष खंडेलवाल कंपनी में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं और 40 वर्षीय बेटी ऋचा खंडेलवाल ब्रांड प्रवक्ता हैं.

आशीष ने संचालन के आधुनिकीकरण में योगदान दिया है. वे कहते हैं, “हम सेमी-ऑटोमैटिक से पूरी तरह स्वचालित पैकेजिंग प्लांट पर आ गए हैं, जो संभवत: हमारे उद्योग में देश में सर्वश्रेष्ठ है.”

“मैंने बड़े होते हुए देखा था कि कैसे मेरे पिता ने शुरुआत से बिजनेस खड़ा किया और इसे महान ऊंचाइयों पर ले गए. उनकी यात्रा ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है. साथ ही यह आगे विस्तार करने और कंपनी को नए स्तर तक ले जाने की चुनौती भी थी.”

घनश्याम अपनी पत्नी, बेटे, बहू और पोते के साथ.  

ऋचा एमबीए पास कर साल 2007 में बीएल एग्रो में शामिल हुईं. वे कहती हैं, “मेरा पहला असाइनमेंट दिल्ली में बीएल एग्रो के लिए बाजार बनाना था. तबसे मेरी भूमिका नए बाजारों का पता लगाने और हमारे ब्रांड की दृश्यता बढ़ाने की रही है.”

वे आत्मविश्वास से कहती हैं, “हाल ही में हमने अपना विज्ञापन खर्च बढ़ाया है और कई विशिष्ट ब्रांड स्टोर खोले हैं. हम अपने बिजनेस के लिए ई-कॉमर्स चैनल विकसित करने को लेकर भी उत्साहित हैं.”



 

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

  • story of Kalpana Saroj

    ख़ुदकुशी करने चली थीं, करोड़पति बन गई

    एक दिन वो था जब कल्पना सरोज ने ख़ुदकुशी की कोशिश की थी. जीवित बच जाने के बाद उन्होंने नई ज़िंदगी का सही इस्तेमाल करने का निश्चय किया और दोबारा शुरुआत की. आज वो छह कंपनियां संचालित करती हैं और 2,000 करोड़ रुपए के बिज़नेस साम्राज्य की मालकिन हैं. मुंबई में देवेन लाड बता रहे हैं कल्पना का अनूठा संघर्ष.
  • seven young friends are self-made entrepreneurs

    युवाओं ने ठाना, बचपन बेहतर बनाना

    हमेशा से एडवेंचर के शौकीन रहे दिल्ली् के सात दोस्‍तों ने ऐसा उद्यम शुरू किया, जो स्कूली बच्‍चों को काबिल इंसान बनाने में अहम भूमिका निभा रहा है. इन्होंने चीन से 3डी प्रिंटर आयात किया और उसे अपने हिसाब से ढाला. अब देशभर के 150 स्कूलों में बच्‍चों को 3डेक्‍स्‍टर के जरिये 3डी प्रिंटिंग सिखा रहे हैं.
  • Food Tech Startup Frshly story

    फ़्रेशली का बड़ा सपना

    एक वक्त था जब सतीश चामीवेलुमणि ग़रीबी के चलते लंच में पांच रुपए का पफ़ और एक कप चाय पी पाते थे लेकिन उनका सपना था 1,000 करोड़ रुपए की कंपनी खड़ी करने का. सालों की कड़ी मेहनत के बाद आज वो उसी सपने की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं. चेन्नई से पीसी विनोज कुमार की रिपोर्ट
  • Malika sadaani story

    कॉस्मेटिक प्रॉडक्ट्स की मलिका

    विदेश में रहकर आई मलिका को भारत में अच्छी गुणवत्ता के बेबी केयर प्रॉडक्ट और अन्य कॉस्मेटिक्स नहीं मिले तो उन्हें ये सामान विदेश से मंगवाने पड़े. इस बीच उन्हें आइडिया आया कि क्यों न देश में ही टॉक्सिन फ्री प्रॉडक्ट बनाए जाएं. महज 15 लाख रुपए से उन्होंने अपना स्टार्टअप शुरू किया और देखते ही देखते वे मिसाल बन गईं. अब तक उनकी कंपनी को दो बार बड़ा निवेश मिल चुका है. कंपनी का टर्नओवर 4 साल में ही 100 करोड़ रुपए काे छूने के लिए तैयार है. बता रही हैं सोफिया दानिश खान.
  • Success story of anti-virus software Quick Heal founders

    भारत का एंटी-वायरस किंग

    एक वक्त था जब कैलाश काटकर कैलकुलेटर सुधारा करते थे. फिर उन्होंने कंप्यूटर की मरम्मत करना सीखा. उसके बाद अपने भाई संजय की मदद से एक ऐसी एंटी-वायरस कंपनी खड़ी की, जिसका भारत के 30 प्रतिशत बाज़ार पर कब्ज़ा है और वह आज 80 से अधिक देशों में मौजूद है. पुणे में प्राची बारी से सुनिए क्विक हील एंटी-वायरस के बनने की कहानी.