Milky Mist

Friday, 9 January 2026

गत्ते के फर्नीचर बनाकर चार साल में कमाने लगी एक करोड़

09-Jan-2026 By देवेन लाड
मुंबई

Posted 19 Mar 2018

अपने गृहराज्‍य बिहार से निकलकर मुंबई में बसना और दस साल से भी कम समय में सफलता पा लेना आसान नहीं.

बंदना जैन अपने परिवार की पहली महिला हैं, जो करियर के लिए अपना गांव छोड़कर मुंबई जा बसीं.

आज 30 साल की यह उद्यमी अपने स्टाइलिश इको-फ्रेंडली फ़र्नीचर के लिए मशहूर है.

गत्ते के बने ये फ़र्नीचर अंधेरी स्थित स्टूडियो और रिटेल वेबसाइट्स से बेचे जाते हैं.

 

बंदना ने साल 2013 में म‍हज 13,000 रुपए से सिल्विन स्‍टूडियो की स्‍था‍पना की थी. (सभी फ़ोटो – मनोज पाटील)

आपको विश्वास नहीं होगा, लेकिन सिल्विन की साल 2017 में एक करोड़ रुपए आमदनी रही है.

50 सदस्यों वाले संयुक्त परिवार में जन्मी बंदना बिहार के छोटे से गांव ठाकुरगंज में रहती थीं.

वो याद करती हैं, हमारे परिवार के सिर्फ़ पुरुष शहर पढ़ने जाते थे. महिलाएं शादी होने तक घरों में ही रहती थीं.

कला में रुचि रखने वाली बंदना जब बचपन में दुर्गा पूजा पंडालों में जाती थीं, तो उनकी ख़ूबसूरती और कलाकारी देख दंग रह जाती थीं. वो जानना चाहती थीं कि इन्‍हें कैसे बनाया जाता है, लेकिन उन्‍हें कलाकारों से बात करने की इजाज़त नहीं होती थी.

जब वो बड़ी हुईं तो कॉमर्स में ग्रैजुएशन के बाद मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट के बारे में सुना. पर परिवार ने कहा कि यह शादी के बाद ही संभव हो सकेगा.

बंदना ने यही किया. उन्होंने आईआईएम लखनऊ में पढ़ रहे अपने ब्वायफ़्रेंड मनीष को मुंबई में जॉब करने के लिए मनाया और साल 2008 में शादी के बाद अपने सपनों का पीछा करती मुंबई आ गईं.

अप्रैल 2008 में उन्‍होंने जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट के लिए प्रवेश पत्र भरा. जून में टेस्‍ट होना था.

उनके पास तैयारी के लिए सिर्फ़ डेढ़ महीने थे. किसी ने उन्हें कॉलेज के पूर्व स्टूडेंट जावेद मुलानी की ट्यूशंस के बारे में बताया और उन्होंने जमकर दिन के 12 घंटे तक पढ़ाई की.

जावेद के साथ उन्होंने अलग नज़रिये से सोचना सीखा. अलग-अलग डिज़ाइन, 2डी, 3डी, मेमोरी डिज़ाइन भी सीखीं.

बचपन में बंदना दुर्गा पूजा के पंडालों से ख़ासी आकर्षित थीं, लेकिन उन्‍हें उन कलाकारों से मिलने की इजाज़त नहीं थी, जो पंडाल बनाते थे.

जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट में बाहरी छात्रों के लिए महज आठ सीटें थीं, लेकिन बंदना की मेहनत रंग लाई और उनका एडमिशन हो गया.

कॉलेज में उन्‍हें बहुत प्रोत्‍साहन और सहयोग मिला. वो कहती हैं, कॉलेज में मेरे चारों तरफ़ बेहद प्रतिभावान छात्र थे, उन्होंने मेरी मदद की. कुछ तो मुझे पढ़ाने घर भी आते थे.

बंदना का कोर्स पूरा हुआ, लेकिन उन्हें पता नहीं था कि वो इस डिग्री का क्या करेें.

वो बताती हैं, उसी समय पति ने एक घर ख़रीदा. मेरे पास काफ़ी वक्त था, इसलिए मैंने घर के लिए एक कुर्सी डिज़ाइन की. मैं चाहती थी कि यह अलग हो, इसलिए इसे गत्ते से बनाने पर विचार किया.

बंदना ने धारावी से लेकर क्रॉफ़ोर्ड मार्केट तक तीन महीने अच्छी क्वालिटी का रिसाइकल्ड गत्ता खोजा, लेकिन नहीं मिला. वो मुंबई में हर कबाड़ी के यहां गईं, लेकिन उन्‍हें निराशा ही हाथ लगी.

आखि़र में एक जगह उन्‍हें गत्‍ता मिल गया, लेकिन अब उसे काटना आसान नहीं था. बंदना बताती हैं, मैंने ऑनलाइन ट्यूटोरियल देखकर एक ब्लैड बनाई, जो गत्ते को ख़राब नहीं करती थी.

बंदना की फैक्‍टरी और स्‍टूडियो में कुल १८ लोग काम करते हैं.

तीन महीने और 4,000 रुपए ख़र्च के बाद आखि़रकार कुर्सी तैयार हो गई.

हंसते हुए बंदना कहती हैं, मुझे लगा कि यह अच्छा आइडिया नहीं है.

लेकिन वो सचमुच एक अच्छा आइडिया था. उन्होंने जेजे के अपने साथी राहुल डोंगरे से मदद मांगी.

राहुल को उनका आइडिया पसंद आया और उन्होंने साल 2013 में महज 13,000 रुपए से सिल्विन की शुरुआत कर दी. राहुल अब स्टूडियो में मैनेजर हैं.

सिल्विन रोमन भगवान का नाम है, जो जंगलों की रक्षा करते हैं. यह नाम इको-फ्रेंडली फ़र्नीचर पर भी सटीक बैठता था.

बंदना बताती हैं, इसके बाद हमने पांच सीटर सोफ़ा बनाया. फिर लैंप के साथ प्रयोग किया. 10-12 लैंप पूरे करने के बाद दोस्तों-परिवार वालों को दिखाए, तो उन्हें बेहद पसंद आए.

गोरेगांव की एक प्रदर्शनी में हिस्सा लेने से उनमें आत्मविश्वास आया. साथ ही सीख भी मिली.

उसके बाद उन्होंने फ़र्नीचर वेबसाइट जैसे पेपरफ़्राई और अमेज़न पर सामान बेचना शुरू कर दिया, जिससे ठीकठाक आमदनी होने लगी.

अपने बनाए एक लैंप के साथ बंदना.

आज सिल्विन की वसई में एक फ़ैक्टरी है, जहां 10 स्थानीय महिलाएं काम करती हैं.

बंदना के काम की ख़ासियत उनका रिसाइकल्ड गत्ता है. उनके लैंप की क़ीमत 4,500 से 7,000 रुपए है. सोफ़े की क़ीमत पांच लाख रुपए तक है.

साल 2020 तक बंदना का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कंपनी को पहुंचाना है. वो कहती हैं, मेरी इच्‍छा है कि मैं सिल्विन को अंतरराष्‍ट्रीय फ़र्नीचर प्रदर्शनी मिलान सालोन डेल मोबाइल में ले जाऊं.


 

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

  • Senthilvela story

    देसी नस्ल सहेजने के महारथी

    चेन्नई के चेंगलपेट के रहने वाले सेंथिलवेला ने देश-विदेश में सिटीबैंक और आईबीएम जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों की 1 करोड़ रुपए सालाना की नौकरी की, लेकिन संतुष्ट नहीं हुए. आखिर उन्होंने पोल्ट्री फार्मिंग का रास्ता चुना और मुर्गियों की देसी नस्लें सहेजने लगे. उनका पांच लाख रुपए का शुरुआती निवेश अब 1.2 करोड़ रुपए सालाना के टर्नओवर में तब्दील हो चुका है. बता रही हैं उषा प्रसाद
  • The Tea Kings

    ये हैं चेन्नई के चाय किंग्स

    चेन्नई के दो युवाओं ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई, फिर आईटी इंडस्ट्री में नौकरी, शादी और जीवन में सेटल हो जाने की भेड़ चाल से हटकर चाय की फ्लैवर्ड चुस्कियों को अपना बिजनेस बनाया. आज वे 17 आउटलेट के जरिये चेन्नई में 7.4 करोड़ रुपए की चाय बेच रहे हैं. यह इतना आसान नहीं था. इसके लिए दोनों ने बहुत मेहनत की.
  • Bareilly’s oil King

    बरेली के बिरले ऑइल किंग

    बरेली जैसे छोटे से शहर से कारोबार को बड़ा बनाने के लिए बहुत जिगर चाहिए. घनश्याम खंडेलवाल इस कोशिश में सफल रहे. 10 लाख रुपए के निवेश से 2,500 करोड़ रुपए टर्नओवर वाला एफएमसीजी ब्रांड बनाया. उनकी कंपनी का पैकेज्ड सरसों तेल बैल कोल्हू देश में मशहूर है. कंपनी ने नरिश ब्रांड नाम से फूड प्रोडक्ट्स की विस्तृत शृंखला भी लॉन्च की है. कारोबार की चुनौतियां, सफलता और दूरदृष्टि के बारे में बता रही हैं सोफिया दानिश खान
  • World class florist of India

    फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन

    आज दुनिया में ‘फ़र्न्स एन पेटल्स’ जाना-माना ब्रैंड है लेकिन इसकी कहानी बिहार से शुरू होती है, जहां का एक युवा अपने पूर्वजों की ख़्याति को फिर अर्जित करना चाहता था. वो आम जीवन से संतुष्ट नहीं था, बल्कि कुछ बड़ा करना चाहता था. बिलाल हांडू बता रहे हैं यह मशहूर ब्रैंड शुरू करने वाले विकास गुटगुटिया की कहानी.
  • Honey and Spice story

    शुद्ध मिठास के कारोबारी

    ट्रेकिंग के दौरान कर्नाटक और तमिलनाडु के युवा इंजीनियरों ने जनजातीय लोगों को जंगल में शहद इकट्‌ठी करते देखा. बाजार में मिलने वाली बोतलबंद शहद के मुकाबले जब इसकी गुणवत्ता बेहतर दिखी तो दोनों को इसके बिजनेस का विचार आया. 7 लाख रुपए लगातार की गई शुरुआत आज 3.5 करोड़ रुपए के टर्नओवर में बदलने वाली है. पति-पत्नी मिलकर यह प्राकृतिक शहद विदेश भी भेज रहे हैं. बता रही हैं उषा प्रसाद