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Sunday, 1 August 2021

छोटे से गांव में जन्मी, लेकिन हमेशा बड़े सपने देखे; 50 हजार रुपए के निवेश से शुरू कर 7 करोड़ टर्नओवर वाली पीआर एजेंसी बनाई

01-Aug-2021 By सोफिया दानिश खान
नई दिल्ली

Posted 08 Jul 2021

गीता सिंह का जन्म उत्तराखंड के एक सुदूर गांव में हुआ था, जहां बमुश्किल 50 लोग रहते थे. उनका पालन-पोषण उत्तर प्रदेश के छोटे शहर मेरठ में हुआ. बड़ी हुईं तो गीता सिंह ने दिल्ली में किस्मत आजमाई. मीडिया में करियर शुरू किया और महज 25 साल की उम्र में उद्यमी बन गईं.

गीता ने 2012 में महज 50,000 रुपए निवेश कर दिल्ली में अपने घर से ही पीआर और संचार फर्म द येलो कॉइन कम्युनिकेशन शुरू की. उस समय उनके पास महज एक कर्मचारी थी. वे उसे 13,000 रुपए तनख्वाह तो देती थीं, लेकिन उन्होंने ऑफिस में काम करने के लिए उसे अपना निजी लैपटॉप लाने के लिए ही कहा.
गीता सिंह ने 25 साल की उम्र में 50,000 रुपए के निवेश से येलो कॉइन कम्युनिकेशन की शुरुआत की थी. (फोटो: विशेष व्यवस्था से)  

सफल होने के दृढ़ संकल्प और कुछ अच्छे मौके मिलने से गीता को कई बड़े क्लाइंट मिले. इससे उनके बिजनेस को 7 करोड़ रुपए के टर्नओवर वाली कंपनी बनने में मदद मिली. आज जसोला में 2,200 वर्ग फुट के ऑफिस में करीब 50 लोग काम करते हैं.

अपने बिजनेस के शुरुआती दिनों को याद करते हुए गीता सिंह बताती हैं, “मैंने अपनी पहली डील मोबाइल इंडिया में की थी. यह डिजिटल गैजेट्स का एक वेब पोर्टल था. उन्हें अपनी वेबसाइट के लिए सामग्री और अंग्रेजी-हिंदी लेखों के अनुवाद की आवश्यकता थी.”

उन महत्वपूर्ण दिनों में, उन्हें अपने पिता से कोई मदद या समर्थन नहीं मिला. गीता के पिता एक सीधे-साधे सरकारी कर्मचारी थे. वे चाहते थे कि गीता उनकी तरह सरकारी नौकरी करे.

वे कहती हैं, “जब मैंने अपनी कंपनी शुरू करने की योजना बनाई, तब पिताजी से सिर्फ 10,000 रुपए लेना चाहे, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मुझे पैसे देने से इनकार कर दिया कि हमारे परिवार में कभी किसी ने बिजनेस नहीं किया था.”

“वे चाहते थे कि मैं सरकारी नौकरियों के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं दूं. मैंने उनसे कहा कि हम कोई शाही परिवार से नहीं हैं. इसलिए मैं अपनी किस्मत आजमाना चाहती हूं. वे मेरी थोड़ी भी मदद नहीं करना चाहते थे. मुझे लगता है कि इसी बात ने मुझे मजबूत बनाया.”

हालांकि, उन्होंने कभी अपने पिता के इरादों पर संदेह नहीं किया. वे अपने चारों बच्चों से बहुत चाहते थे.
गीता पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के एक छोटे से गांव की रहने वाली हैं.


गीता बसंती देवी और मान सिंह के यहां पैदा हुई तीसरी संतान थीं. मान सिंह ने अपना करियर एक सरकारी संगठन में लोअर डिवीजन क्लर्क के रूप में 500 रुपए वेतन से शुरू किया था.

वे अपने गांव के सरकारी नौकरी पाने वाले पहले व्यक्ति थे. गीता ने अपने जीवन के शुरुआती चार साल उत्तराखंड के उसी गांव में बिताए. गीता कहती हैं, “यह गांव छोटे से शहर बागेश्वर से कुछ किलोमीटर दूर था.”

“50 लोगों की आबादी वाले सुदूर गांव फुल्ला कपकोट में जीवन बहुत मुश्किल था. घरों में 5 किमी की दूरी थी. अधिकांश लोगों के पास लंबी-चौड़ी जमीनें थीं. वे पशुपालन के साथ-साथ सीढ़ीदार खेतों पर खेती करते थे.”

“जब मां की शादी हुई, तब वे 14 साल की थीं और पिताजी 10वीं कक्षा में पढ़ते थे. मेरे पिताजी नहीं चाहते थे कि उनकी पत्नी या बच्चे उन्हीं की तरह जीवन जिएं. वे उन्हें बेहतर जीवन देना चाहते थे. इसलिए जब पहली बार तबादले का मौका आया तो वे मेरठ रहने चले आए.”

उनके पिता जब मेरठ आए थे, तब उनके हाथ में सिर्फ 50 रुपए, एक सूटकेस और तीन छोटे बच्चे व पत्नी थी. रितिका का जन्म चार साल बाद मेरठ में हुआ, जो द येलो कॉइन कम्युनिकेशन की निदेशक हैं.

गीता अपनी जड़ों के बारे में बताती हैं और कहती हैं कि तबसे जीवन किस तरह बदल गया है. वे हंसते हुए कहती हैं, “अब हमें कपड़ों से भरे सूटकेस रखने के लिए फटकार लगाई जाती है, जिन्हें हम शायद ही पहनती हैं.”

मेरठ में गीता को एक सरकारी स्कूल में भर्ती करा दिया गया. पहाड़ी क्षेत्र की मजबूत बच्ची होने के नाते गीता ने ट्रैक और फील्ड स्पर्धाओं में कई प्रतियोगिताएं जीतीं.

वे कहती हैं, “जब हम मेरठ आए, तो मैं केवल कुमाऊं भाषा बोलती थी. हम हिंदी भाषा नहीं जानते थे. बच्चे मुझे पहाड़ी आलू जैसे नामों से बुलाते थे क्योंकि मैं रंग गोरा था. मेरे पिता उनकी उपेक्षा करने को कहते थे.”

गीता पिता से बहुत प्यार करती थीं. वे अक्सर उन्हें प्रेरक महिलाओं, साधारण पृष्ठभूमि वाले आईएएस अधिकारियों की कहानियां सुनाते थे. और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करते थे.

गीता ने 2006 में मेरठ से 12वीं की पढ़ाई पूरी की और जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से दो साल के डिप्लोमा कोर्स के लिए नोएडा आकर रहने लगीं.

कोर्स के दूसरे वर्ष में, दैनिक जागरण और जी टीवी सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों में इंटर्नशिप करते हुए गीता ने राजनीति विज्ञान ऑनर्स में स्नातक की डिग्री के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया.

वे कहती हैं, “मैं सुबह 10 से दोपहर 2 बजे तक कॉलेज जाती थी. फिर दोपहर 3 से 10 बजे तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स्टूडियो में काम करती थी, वीडियो संपादित करती थी. कभी-कभी देर रात के लिए स्लॉट के लिए एंकरिंग और रिपोर्टर का काम भी किया.”

ग्रैजुएशन के बाद कुछ वर्ष उन्होंने बीबीसी के डॉक्यूमेंट्री डिपार्टमेंट, चैनल वी, जीवा आयुर्वेद की संचार टीम समेत पीआर एजेंसियों और विज्ञापन एजेंसियों में काम किया.
येलो कॉइन कम्युनिकेशन की टीम में अब 50 सदस्य काम करते हैं.


4,000 रुपए की इंटर्नशिप से शुरुआत करने वाली गीता को पहली तनख्वाह के रूप में 16,000 रुपए मिले. एक से दूसरी नौकरी बदलते हुए उन्होंने अच्छे पैसे कमाए. उन्होंने वीडियो एडिटर के रूप में फ्रीलांसिंग भी की. इसके उन्हें 2 हजार रुपए प्रति घंटे मिलते थे.

वे कहती हैं, “ऐसे भी समय रहे, जब मैंने कुछ लोगों के लिए मुफ्त काम किया. लेकिन यह मेहनत लंबे समय में काम आई. इन्हीं लोगों ने ऐसे लोगों से मेरा संपर्क करवाया, जिनसे मुझे बेहतर प्रोजेक्ट मिले.”

2012 में गीता ने प्राेप्रायटरशिप फर्म द येलो कॉइन कम्युनिकेशन की शुरुआत की. इसके बाद उन्हें छोटे प्रोजेक्ट मिलने लगे. मोबाइल इंडिया के साथ डील के बाद उन्हें चेतन भगत के नॉवेल रिवोल्यूशन 2020 के प्रचार का काम मिला.

वे कहती हैं, “इस तरह काम बढ़ना शुरू हो गया. मैंने कुछ फ्रीलांसरों को काम पर रखा. गौरव तिवारी ने मुझे बिल बनाना सीखने में मदद की. कई बार ग्राहकों के साथ बैठकों के लिए भी वे मेरे साथ जाते थे. मेरे मेरे मित्र कम परामर्शदाता अधिक हैं.”

2014 में यह एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गई. उसी साल पतंजलि भी उनकी क्लाइंट बनी.

गीता साल-दर-साल ग्राहक जोड़ती रहीं और उनका बिजनेस बढ़ता गया. वे कहती हैं, “2015 में कंपनी का टर्नओवर 1 करोड़ रुपए तक पहुंच गया. हमने अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए स्मार्ट दिमाग को काम पर रखा. हमने इवेंट्स, पीआर, सोशल कैंपेन करने शुरू कर दिए थे. इस तरह हर क्षेत्र में मेरा दखल था.”

पीछे मुड़कर देखने पर ऐसा नहीं लगता कि यह पूरी यात्रा आसान थी. उनके पास पैसों की कमी थी और कई बार उनके पास तंगी रहती थी. ऐसे में वे अपनी कमाई के पैसे वापस में कंपनी में लगा देती थीं.

वे कंपनी शुरू करने के पहले 2011 के आसपास का समय याद करती हैं. एक बार उनके पर्स में महज 20 रुपए थे और उन्होंने पहली बार डीटीसी की बस में बिना टिकट यात्रा करने का फैसला किया था.
गीता कहती हैं कि वे उन मूल्यों से प्रेरित हैं, जो उनके पिता ने उन्हें सिखाए थे.

लेकिन उनका दुर्भाग्य कि एक टिकट चेकर बस में चढ़ गया. वे जल्दबाजी में बस से उतरीं. बाद में उन्हें याद आया कि उन्होंने अपना लैपटॉप तो बस में ही छोड़ दिया है. उन्होंने महसूस किया कि ईश्वर ने उन्हें गलत काम की सजा दी है. उस दिन उन्होंने एक सबक सीखा.

गीता को ओजस्वी के रूप में भगवान का आशीर्वाद मिला है. यह जून 2020 में लॉकडाउन के दौरान पैदा हुई थी. उनके पति सौरभ सुप्रीम कोर्ट वकील हैं. वे उनसे जागरण इंस्टीट्यूट में मिली थीं, जहां वे भी लॉ की डिग्री से पहले की पढ़ाई कर रहे थे.

गीता सिंह को लगता है कि आजकल वे अपने पिता की तरह बात करने लगी हैं. अपनी बात खत्म करते हुए वे कहती हैं, “खर्च करना, बचत करना और बांटना सबका एक जैसा महत्व है. आखिर में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कहां से आते हैं या आपका स्कूल कितना महंगा था. आपकी कड़ी मेहनत ही आपको जीवन में सफल होने में मदद करती है.”

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