Saturday, 15 May 2021

अपने राज्य बिहार को गुजरात की तरह समृद्ध बनाने की धुन

15-May-2021 By जी सिंह
पटना

Posted 20 Jan 2018

क़रीब दस साल पहले जब कौशलेंद्र ने शुरुआत की थी, तब उनके पास बस एक छोटा कमरा और ख़ुद का एक सपना था.


आज उनका ग़ैर लाभकारी उपक्रम कौशल्या फ़ाउंडेशन बिहार में 20,000 से अधिक किसानों को मौजूदा प्रतिस्पर्धी बाज़ार में कमाई करने के लिए ज़रूरी हुनर सिखाने में मदद कर रहा है.

और उनकी ग़ैर लाभकारी कंपनी ने ताज़ी सब्ज़ियां बेचकर पांच करोड़ रुपए का ठीकठाक कारोबार कर लिया है.

आईआईएम अहमदाबाद की एक बैच के टॉपर कौशलेंद्र ने दो कंपनियां स्थापित कीं - कौशल्या फ़ाउंडेशन, जिसका मकसद मुनाफ़ा कमाना नहीं था, और 2008 में निड्स ग्रीन प्राइवेट लिमिटेड (केजीपीएल).

कौशलेंद्र कई मायनों में सबसे अलग हैं. समाज में जिस तरह जाति और धर्म के आधार पर लोग बंटे हैं, उसके विरोध में उन्होंने कभी अपना उपनाम नहीं रखा.

प्रतिष्ठित भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद से टॉप करने के बाद वो चाहते तो किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के लिए काम कर सकते थे या विदेश जा सकते थे. उनके कई साथियों ने ऐसा ही किया.
उन्होंने अलग रास्ता चुना. वो बाहर निकले और संभावनाएं तलाषीं. वो अपने गृह राज्य बिहार के लोगों की ज़िंदगी में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते थे.

कौशलेंद्र कहते हैं, “मुझे पता था कि यह तभी संभव था, जब मैं ज़मीनी स्तर पर काम की शुरुआत करूं.”

बिहार के नालंदा जिले के मोहम्मदपुर गांव में 14 जनवरी 1981 को उनका जन्म हुआ. तीन बच्चों में कौशलेंद्र सबसे छोटे हैं. उनके माता-पिता सरकारी नौकरियों में थे. कक्षा पांच तक उनकी पढ़ाई गांव के ही हिंदी मीडियम के सरकारी स्कूल में हुई.

जल्द ही उनके माता-पिता को पास स्थित एक बड़े और बेहतर स्कूल के बारे में पता चला। उनके माता-पिता ने मौक़े का फ़ायदा उठाया और कौशलेंद्र का दाख़िला गांव से 50 किलोमीटर दूर रेवाड़ के जवाहर नवोदय विद्यालय के बोर्डिंग स्कूल करवा दिया गया. यह स्कूल उनके जीवन में बदलाव की शुरुआत था.

कौशलेंद्र स्पष्ट करते हैं, “इस स्कूल में दाख़िले के लिए परीक्षा देनी होती है. चुने हुए छात्रों को मुफ़्त शिक्षा दी जाती है. केंद्र सरकार रहने और खाने का सारा ख़र्च उठाती है.”
 

अगर आपमें योग्यता है तो इस बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप ग़रीब हैं. कभी-कभी यहां आने वाले छात्र इतने ग़रीब होते थे कि छुट्टियों में वो अपने घर भी नहीं जा पाते थे, क्योंकि उनके परिवारों के पास उन्हें खिलाने के लिए कुछ भी नहीं होता.

वो कहते हैं, ”मैंने यह सब कुछ देखा और मुझे लगा कि इनके दुख-दर्द के लिए समाज ज़िम्मेदार है. हमने ग़रीबों के लिए पर्याप्त मौके़ उत्पन्न ही नहीं किए हैं.“

कौशल्या फ़ाउंडेशन बिहार के 20,000 से अधिक किसानों की मदद करता है.

1996 में उन्होंने स्कूल पास किया. तब तक उनके दिमाग़ में यह बात आ चुकी थी कि उन्हें सामाजिक असमानता से निपटने के लिए कुछ करने की ज़रूरत है.

पटना के साइंस कॉलेज से हायर सेकंडरी पास करने के बाद कौशलेंद्र गुजरात के जूनागढ़ में इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) से एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग में बीटेक करने चले गए.

वो कहते हैं, “मैं आईआईटी जाना चाहता था, लेकिन प्रवेश परीक्षा पास नहीं कर पाया. हालांकि अब मुझे लगता है कि किसानों के लिए काम करना मेरी क़िस्मत में था, जो मुझे आईसीएआर तक लेकर गया.”

गुजरात में बिताए गए उन चार सालों ने युवा कौशलेंद्र के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला. गुजरात की मूलभूत सुविधाओं और साथियों की उद्यमी मानसिकता से कौशलेंद्र बहुत प्रभावित हुए.

वो याद करते हैं, “उस वक्त मेरे राज्य में न ठीकठाक सड़कें थीं न बिजली की अच्छी व्यवस्था, जबकि गुजरात में बिजली की कोई समस्या ही नहीं थी. वहां की सड़कें भी बहुत अच्छी थीं.

“दूसरों से अलग मेरे गुजराती दोस्त प्लेसमेंट की चिंता नहीं करते थे. वो सब उद्यमी बनना चाहते थे और ख़ुद का कोई काम शुरू करना चाहते थे. उनसे प्रभावित होकर मैंने भी ख़ुद का कुछ शुरू करने का फ़ैसला किया. मेरा सपना था कि मेरा राज्य भी गुजरात की तरह समृद्ध हो.”

कौशलेंद्र ने छह महीने एक इसराइली कंपनी के साथ काम किया. वह कंपनी सिंचाई के लिए ड्रिप इरिगेशन सिस्टम का निर्माण करती थी. उसके बाद उन्होंने आईआईएम में दाख़िला ले लिया. (फ़ोटो - मोनिरुल इस्लाम मलिक)

वर्ष 2003 में उन्हें अपने कोर्स में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन के लिए गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया. इसके बाद उन्होंने नेटाफ़िम नामक एक इसराइली कंपनी में ट्रेनी फ़ील्ड अफ़सर के तौर पर काम करना शुरू कर दिया.

यह कंपनी सिंचाई के लिए ड्रिप इरिगेशन सिस्टम का निर्माण करती थी. इस काम के लिए कौशलेंद्र को हर महीने 6,000 रुपए मिलते थे. उन्हें आंध्र प्रदेश भेजा गया, जहां उनका काम किसानों से मिलना था और उन्हें कंपनी के उत्पादों के बारे में समझाना था.

वो कहते हैं, “मेरा काम किसानों से बातचीत करना और उनकी समस्याओं को समझना था. मुझे अहसास हुआ कि हमारे किसानों को खेती से अधिक उपज पाने के सही तरीक़े इस्तेमाल करने के लिए शिक्षित करने की ज़रूरत है.”

उन्होंने कुछ नया शुरू करने के बारे में सोचना शुरू कर दिया था. वर्ष 2004 के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया.

नौकरी छोड़ने के बाद तो अपने दोस्त पंकज कुमार से मिलने अहमदाबाद गए. पंकज एमबीए की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहे थे.


कौशलेंद्र याद करते हैं, “आगे ज़िंदगी में क्या करना है, इसे लेकर मैं बहुत परेशान था, इसलिए मैंने भी एमबीए की प्रवेश परीक्षा के लिए कोचिंग लेनी शुरू कर दी.”


कौशलेंद्र ने कैट पास की और आखिरकार उन्हें वर्ष 2005 में आईआईएम अहमदाबाद में दाख़िला मिल गया.
उन्होंने एक राष्ट्रीयकृत बैंक से चार लाख रुपए का कर्ज़ लिया और वर्ष 2007 में अपनी बैच के टॉपर रहे। इसके लिए उन्हें 25,000 रुपए का पुरस्कार मिला.

पटना लौटने के तुरंत बाद उन्होंने अपने सपने को सच करने के लिए व्यवस्थित तरीक़े से काम करने का फ़ैसला किया.

इनाम की रकम से उन्होंने पटना में 1,200 रुपए महीने पर 100 वर्ग फ़ुट का कमरा किराए पर लिया. उसके बाद उन्होंने राज्य का दौरा शुरू किया. इस दौरे में उन्होंने किसानों से मुलाक़ात की.

अपनी पत्नी रेखा कुमारी के साथ कौशलेंद्र अपने दफ़्तर में.

कौशलेंद्र स्पष्ट करते हैं, “मैं इस बात पर भरोसा करता था कि मेरे राज्य के हालात तभी बदले जा सकते हैं जब किसानों की ज़िंदगी बेहतर हो, और ये बदलाव ज़मीनी स्तर पर आना चाहिए. मैंने नौ महीने राज्य का दौरा किया. गांवों में गया, किसानों से उनकी परेशानियों के बारे बात की. मैंने उनकी फ़सलों पर होने वाले ख़र्च व मुनाफ़े पर बात की और उसे समझने की कोशिश की.”

कौशलेंद्र को अहसास हुआ कि इस सेक्टर को ज़्यादा संगठित होने की ज़रूरत है.

जनवरी 2008 तक उन्होंने दो कंपनियों का गठन किया - ग़ैर लाभकारी कौशल्या फ़ाउंडेशन, और निड्स ग्रीन प्राइवेट लिमिटेड (केजीपीएल), जो एक व्यावसायिक कंपनी थी.


उन्होंने बड़े भाई धीरेंद्र कुमार के साथ उसी किराए के कमरे से काम शुरू किया. धीरेंद्र ने एक दवा बनाने वाली कंपनी में नौकरी छोड़कर कौशलेंद्र का साथ पकड़ा था.

वे बताते हैं, “मैंने फ़ैसला किया कि मैं किसानों को खाद और खेती के विभिन्न तरीक़ों के बारे में शिक्षित करूंगा, ताकि वो अपनी उपज बढ़ा सकें. मैं उन्हें मुनाफ़ा बढ़ाने के तरीक़ों के बारे में बताना चाहता था.”

दूसरी ओर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का मक़सद था किसानों से ताज़ी सब्ज़ियां ख़रीदना और दुकानदारों को अच्छे दामों में बेचना.

वो कहते हैं, “मेरा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि किसानों को अपनी फ़सल का बेहतर दाम मिले और उपभोक्ताओं को कम दाम पर अच्छी गुणवत्ता का सामान मिले. केजीपीएल का मुख्य काम था सप्लाई चेन मार्केटिंग पर ध्यान केंद्रित करना.” सब्ज़ियां ‘समृद्धि ग्रीन एसी कार्ट्स’ के ज़रिये बेची जाने लगीं.

कौशल्या फ़ाउंडेशन की शुरुआत 50,000 रुपए से हुई, जिसे दोस्तों और परिवार की मदद से इकट्ठा किया गया.

मार्च 2008 में कौशलेंद्र को एक राष्ट्रीयकृत बैंक से 50 लाख रुपए क़र्ज पाने में सफ़लता मिली.

उसी साल एक प्रोफ़ेसर ने उनका परिचय फ्रेंड्स ऑफ़ वूमेंस वर्ल्ड बैंकिंग (एफ़एफ़डब्ल्यूबी) से करवाया जिन्होंने कौशलेंद्र को पांच लाख का और कर्ज़ दिया.

निड्स ग्रीन प्राइवेट लिमिटेड ने 2016-17 में पांच करोड़ रुपए का कारोबार किया.

असली काम अभी आगे थे. किसानों को अपने आइडिया के बारे में समझाना उतना आसान नहीं था, जितना उन्होंने शुरुआत में सोचा था.

वे कहते हैं, “किसी ने मेरे ट्रेनिंग के आइडिया को गंभीरता से नहीं लिया. उन्हें लगा कि नौकरी नहीं करके मैंने अपनी पढ़ाई बर्बाद कर दी है और अब उनके कारोबार को बर्बाद करने पर तूला हूं.” किसी को भी समझाना बहुत मुष्किल था.

आख़िरकार कौशलेंद्र ने मात्र तीन किसानों के साथ ट्रेनिंग की शुरुआत की.

कौशलेंद्र याद करते हैं, “हमने क़र्ज के पैसे से 30 वातानुकूलित वाहन ख़रीदे. हमने दुकानदारों को विश्वास दिलाया कि वो हमारी सब्ज़ियां रखें और उन्हें बाक़ी दुकानदारों से सस्ता बेचे.“ मेरे भाई और मैंने भी पटना की सड़कों पर सब्ज़ियां बेचीं.”

शुरुआत में यह तजुर्बा रोमांचित करने वाला था, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें घाटा होने लगा.


पहले साल (2008-09) का कुल टर्नओवर छह लाख रुपए का था. वर्ष 2011-12 तक पटना में कंपनी की 65 गाड़ियां सब्ज़ियां बेच रही थीं और कुल व्यापार 70 लाख रुपए तक पहुंच गया था, लेकिन घाटा जारी रहा.

कौशलेंद्र समझाते हैं, “कारोबार में बढ़ोतरी के बावजूद हमें घाटा हो रहा था, क्योंकि हम किसानों को अच्छा दाम दे रहे थे और अपना सामान काम दाम पर बेच रहे थे.”
 

आख़िरकार वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव किया और विक्रेताओं को दामों में बदलाव की अनुमति दे दी. साथ ही उन्होंने अपनी कंपनी को दोबारा संगठित किया, ताकि खर्चे कम किए जा सकें.

कौशल्या फ़ाउंडेशन में अपनी टीम के सदस्यों के साथ कौशलेंद्र.

 

आज एक तरफ़ कौशल्या फ़ाउंडेशन किसानों को प्रशिक्षण देती है, तो दूसरी ओर केजीपीएल उपभोक्ताओं ख़ासकर संस्थागत उपभोक्ताओं पर ध्यान केंद्रित करता है.


वर्ष 2016-17 में केजीपीएल ने कुल पांच करोड़ रुपए का कारोबार दर्ज किया.

पटना में अपने भव्य दफ़्तर में बैठे कौशलेंद्र कहते हैं, “खेती के विभिन्न पहलुओं पर किसानों का प्रशिक्षण जारी है. वो चाहें तो केजीपीएल के अलावा किसी और को भी, जो उन्हें सबसे अच्छा दाम दे, अपना सौदा बेच सकते हैं.”

युवाओं के लिए उनकी क्या सलाह होगी?

कौशलेंद्र कहते हैं, “अपने सपनों का पीछा करो और कभी हार मत मानो. दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है.”


Milky Mist
 

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

  • Aamir Qutub story

    कुतुबमीनार से ऊंचे कुतुब के सपने

    अलीगढ़ जैसे छोटे से शहर में जन्मे आमिर कुतुब ने खुद का बिजनेस शुरू करने का बड़ा सपना देखा. एएमयू से ग्रेजुएशन के बाद ऑस्ट्रेलिया का रुख किया. महज 25 साल की उम्र में अपनी काबिलियत के बलबूते एक कंपनी में जनरल मैनेजर बने और खुद की कंपनी शुरू की. आज इसका टर्नओवर 12 करोड़ रुपए सालाना है. वे अब तक 8 स्टार्टअप शुरू कर चुके हैं. बता रही हैं सोफिया दानिश खान...
  • Senthilvela story

    देसी नस्ल सहेजने के महारथी

    चेन्नई के चेंगलपेट के रहने वाले सेंथिलवेला ने देश-विदेश में सिटीबैंक और आईबीएम जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों की 1 करोड़ रुपए सालाना की नौकरी की, लेकिन संतुष्ट नहीं हुए. आखिर उन्होंने पोल्ट्री फार्मिंग का रास्ता चुना और मुर्गियों की देसी नस्लें सहेजने लगे. उनका पांच लाख रुपए का शुरुआती निवेश अब 1.2 करोड़ रुपए सालाना के टर्नओवर में तब्दील हो चुका है. बता रही हैं उषा प्रसाद
  • Once his family depends upon leftover food, now he owns 100 crore turnover company

    एक रात की हिम्मत ने बदली क़िस्मत

    बचपन में वो इतने ग़रीब थे कि उनका परिवार दूसरों के बचे-खुचे खाने पर निर्भर था, लेकिन उनका सपना बड़ा था. एक दिन वो गांव छोड़कर चेन्नई आ गए. रेलवे स्टेशन पर रातें गुजारीं. आज उनका 100 करोड़ रुपए का कारोबार है. चेन्नई से पी.सी. विनोज कुमार बता रहे हैं वी.के.टी. बालन की सफलता की कहानी
  • Story of Sattviko founder Prasoon Gupta

    सात्विक भोजन का सहज ठिकाना

    जब बिजनेस असफल हो जाए तो कई लोग हार मान लेते हैं लेकिन प्रसून गुप्ता व अंकुश शर्मा ने अपनी गलतियों से सीख ली और दोबारा कोशिश की. आज उनकी कंपनी सात्विको विदेशी निवेश की बदौलत अमेरिका, ब्रिटेन और दुबई में बिजनेस विस्तार के बारे में विचार कर रही है. दिल्ली से सोफिया दानिश खान की रिपोर्ट.
  • UBM Namma Veetu Saapaadu hotel

    नॉनवेज भोजन को बनाया जायकेदार

    60 साल के करुनैवेल और उनकी 53 वर्षीय पत्नी स्वर्णलक्ष्मी ख़ुद शाकाहारी हैं लेकिन उनका नॉनवेज होटल इतना मशहूर है कि कई सौ किलोमीटर दूर से लोग उनके यहां खाना खाने आते हैं. कोयंबटूर के सीनापुरम गांव से स्वादिष्ट खाने की महक लिए उषा प्रसाद की रिपोर्ट.