Milky Mist

Sunday, 31 August 2025

ख़ुद वेजिटेरियन हैं, पर नॉनवेज भोजन बनाने में इन्हें महारत हासिल है

31-Aug-2025 By उषा प्रसाद
कोयंबटूर

Posted 05 May 2018

कोयंबटूर से 79 किलोमीटर दूर है इरोड जिला. यहां सीनापुरम गांव में अपने घर पर होटल चला रहे एक दंपति की बदौलत गांव को दुनिया के नक्शे पर पहचान मिली है.

होटल का नाम है यूबीएम नम्मा वीटू सापाडु. यहां नॉनवेज (मांसाहारी) भोजन मिलता है जिसे खाने बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों से भी लोग आते हैं.

यूबीएम नम्मा वीटू सापाडु में ग्राहकों को भोजन परोसते आर. करुनैवेल और स्वर्णलक्ष्मी. (सभी फ़ोटो – एच.के. राजाशेकर)


होटल की ख़ासियत यहां 500 रुपए (कुछ मामलों में 700 रुपए तक) में मिलने वाला पेटभर भोजन है. इसमें मटन, चिकन, फ़िश, टर्की आदि से बने क़रीब 20 प्रकार के परंपरागत मांसाहारी व्‍यंजन परोसे जाते हैं.

भोजन सात से आठ फ़ीट लंबे केले के पत्ते पर सर्व किया जाता है. एक पत्ते पर चार से पांच लोगों का परिवार साथ बैठकर भोजन कर सकता है.

आप चाहें तो छोटे पत्ते पर भी खाना परोसा जाता है.

होटल के मालिक हैं 60 साल के आर. करुनैवेल और उनकी 53 वर्षीय पत्नी स्वर्णलक्ष्मी.

करुनैवेल बताते हैं, सप्ताह के अंत या छुट्टियों में होटल में क़रीब 150 लोग आते हैं. बाकी दिनों में यह संख्‍या 50 तक रह जाती है.

एक ग्राहक को अपने हाथों से खिलाते करुनैवेल.


लोग अपने पसंदीदा भोजन के लिए 150 से 200 किलोमीटर तक का सफ़र करके आते हैं.

करुनैवेल कहते हैं, होटल से जाते समय लोगों के चेहरों की मुस्कुराहट मुझे और मेहनत करने की ऊर्जा देती है.

विभिन्‍न मांसाहारी खाना जैसे मटन कोलांबू, रथपोरियाल, कुडाल करी, थलाईकरी, लिवर करी तथा ब्रॉयलर चिकन व नाटुकोली (कंट्री) चिकन से बनी डिश, मीनकोलांबू (फ़िश करी) के अलावा यहां चावल, रसम और दही भी उपलब्‍ध रहता है.

करुनैवेल की होटल के बाहर अपनी बारी का इंतज़ार करती भीड़.

रोचक बात यह है कि करुनैवेल और उनकी पत्‍नी दोनों कठोर शाकाहारी हैं.

करुनैवेल बताते हैं, मैं भगवान शिव को मानने वाला हूँ. मैं अंडा तक नहीं खाता. मैं दिन में एक बार शाम पांच बजे शुद्ध शाकाहारी भोजन करता हूं. यह खाना मेरी आठ साल की पोती मुझे खिलाती है. मेरी पत्नी ने आठ साल पहले मांसाहारी खाना छोड़ दिया था.

करुनैवेल और उनकी पत्‍नी भोजन बनाने का आनंद लेते हैं और लोगों को मन भरने तक खिलाते हैं.


...तो फिर यह होटल कैसे शुरू हुआ?

इस सवाल पर करुनैवेल बताते हैं, हमारा परिवार मेहमाननवाज़ी के लिए जाना जाता था. मेरे दादा-दादी इस बात को सुनिश्चित करते थे कि घर आया कोई व्यक्ति भूखा न जाए. मेरे माता-पिता ने भी इस बात का पालन किया और हम भी इसी परंपरा को निभा रहे हैं.

 “हालांकि हमारा परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था, लेकिन हम लोगों को मुफ़्त खाना नहीं खिला सकते थे क्योंकि मांसाहारी भोजन महंगा पड़ता था और इतनी बड़ी संख्या में लोगों को खाना खिलाना संभव नहीं था.

जब करुनैवेल युवा थे तो वो घर में कई तरह का स्‍वादिष्‍ट खाना खाकर बड़े हुए.

वो बताते हैं, स्वाद और प्रामाणिकता ऐसी बातें हैं, जिससे हम समझौता नहीं कर सकते. प्रत्‍येक मांसाहारी डिश की रेसिपी में थोड़े बदलाव किए गए. ये हमारे बुज़ुर्गों की भेंट है.

किचन में भोजन गर्म करतीं स्‍वर्णलक्ष्‍मी.


साल 1992-93 में करुनैवेल के परिवार ने अपने गांव के आराघर में एक कैंटीन से शुरुआत की. छह साल बाद इसे उन्होंने अपने घर से आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया.

करुनैवेल बताते हैं, चूंकि हमारा घर मुख्य सड़क पर है, इसलिए वहां से गुज़रने वाले सरकारी अधिकारी भोजन करने के लिए रुक जाते थे. धीरे-धीरे लोग हमारे बारे में जानने लगे और आने लगे.

पति-पत्नी ख़ुद ही मीट और मसाले चुनते हैं. करुनैवेल मीट की गुणवत्‍ता, मछली आदि की जांच करते हैं और पत्‍नी को बताते हैं कि मसाला पेस्ट कैसे बनाया जाए.

वो कहते हैं, खाना पूरी तरह मेरी पत्नी बनाती है. इस तरह हम खाने की गुणवत्‍ता पर बेहतर नियंत्रण रख पाते हैं.

होटल में स्‍वादिष्‍ट भोजन का इंतज़ार करता परिवार.


हमारा मक़सद है कि लोग यहां घर की तरह महसूस करें और अपने परिवार के साथ मिलकर एक पत्ते पर खाना खाएं. जो लोग एक पत्ते पर खाना खाने से हिचकते हैं, उन्हें हम अलग-अलग छोटे पत्तों पर खाना सर्व करते हैं.

संयोगवश अगर आप शाकाहारी हैं और यूबीएम के सामने से गुज़रते हैं, तो चिंता की बात नहीं है.

करुनैवेल कहते हैं, लगभग रोज़ ही पांच लोगों के लिए पर्याप्‍त शाकाहारी भोजन उपलब्‍ध रहता है. यहां आने वाला कभी बिना खाए नहीं जाता.

होटल के सामने का नज़ारा.


करुनैवेल कहते हैं, “मेरी मेहनत का पुरस्‍कार यही है कि यूबीएम नम्मा वीटू सापाडु हमारे स्‍थायी ग्राहकों के बीच जाना-माना नाम बन गया है.”


 

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

  • Astha Jha story

    शादियां कराना इनके बाएं हाथ का काम

    आस्था झा ने जबसे होश संभाला, उनके मन में खुद का बिजनेस करने का सपना था. पटना में देखा गया यह सपना अनजाने शहर बेंगलुरु में साकार हुआ. महज 4000 रुपए की पहली बर्थडे पार्टी से शुरू हुई उनकी इवेंट मैनेटमेंट कंपनी पांच साल में 300 शादियां करवा चुकी हैं. कंपनी के ऑफिस कई बड़े शहरों में हैं. बता रहे हैं गुरविंदर सिंह
  • Santa Delivers

    रात की भूख ने बनाया बिज़नेसमैन

    कोलकाता में जब रात में किसी को भूख लगती है तो वो सैंटा डिलिवर्स को फ़ोन लगाता है. तीन दोस्तों की इस कंपनी का बिज़नेस एक करोड़ रुपए पहुंच गया है. इस रोचक कहानी को कोलकाता से बता रहे हैं जी सिंह.
  • Match fixing story

    जोड़ी जमाने वाली जोड़ीदार

    देश में मैरिज ब्यूरो के साथ आने वाली समस्याओं को देखते हुए दिल्ली की दो सहेलियों मिशी मेहता सूद और तान्या मल्होत्रा सोंधी ने व्यक्तिगत मैट्रिमोनियल वेबसाइट मैचमी लॉन्च की. लोगों ने इसे हाथोहाथ लिया. वे अब तक करीब 100 शादियां करवा चुकी हैं. कंपनी का टर्नओवर पांच साल में 1 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. बता रही हैं सोफिया दानिश खान
  • Snuggled in comfort

    पसंद के कारोबारी

    जयपुर के पुनीत पाटनी ग्रैजुएशन के बाद ही बिजनेस में कूद पड़े. पिता को बेड शीट्स बनाने वाली कंपनी से ढाई लाख रुपए लेने थे. वह दिवालिया हो रही थी. उन्होंने पैसे के एवज में बेड शीट्स लीं और बिजनेस शुरू कर दिया. अब खुद बेड कवर, कर्टन्स, दीवान सेट कवर, कुशन कवर आदि बनाते हैं. इनकी दो कंपनियों का टर्नओवर 9.5 करोड़ रुपए है. बता रही हैं उषा प्रसाद
  • The rich farmer

    विलास की विकास यात्रा

    महाराष्ट्र के नासिक के किसान विलास शिंदे की कहानी देश की किसानों के असल संघर्ष को बयां करती है. नई तकनीकें अपनाकर और बिचौलियों को हटाकर वे फल-सब्जियां उगाने में सह्याद्री फार्म्स के रूप में बड़े उत्पादक बन चुके हैं. आज उनसे 10,000 किसान जुड़े हैं, जिनके पास करीब 25,000 एकड़ जमीन है. वे रोज 1,000 टन फल और सब्जियां पैदा करते हैं. विलास की विकास यात्रा के बारे में बता रहे हैं बिलाल खान