Milky Mist

Thursday, 3 April 2025

दंगे की भेंट चढ़ी फैक्टरी, पर फिर उठ खडे़ हुए, अब सालाना टर्नओवर है 350 करोड़ रुपए

03-Apr-2025 By गुरविंदर सिंह
गिरिडीह (झारखंड)

Posted 13 May 2019

झारखंड के नगर गिरिडीह में स्‍टील का बादशाह हर जगह मौजूद है. काली पगड़ी बांधे और हाथों में टीएमटी सरिया थामे गुणवंत सिंह मोंगिया नगर में हर पोस्‍टर पर नजर आते हैं. इन पर लिखा है ‘‘स्‍टील का बादशाह.’’

गुणवंत सिंह टीएमटी सरिया बनाने वाली कंपनी मोंगिया स्‍टील लिमिटेड के ब्रांड एंबेसडर ही नहीं हैं, बल्कि कंपनी के संस्‍थापक भी हैं. एक ऐसी कंपनी जिसका वर्ष 2018-2019 में टर्नओवर 350 करोड़ रुपए रहा है. मोंगिया झारखंड के सफलतम सरिया निर्माताओं में से एक हैं.

वर्ष 1984 में सिख विरोधी दंगों में दंगाइयों ने गुणवंत सिंह मोंगिया की रोलिंग मिल में लूटपाट कर ली थी. इसके बाद उन्‍होंने कारोबार फिर खड़ा किया. (सभी फोटो : मोनिरुल इस्‍लाम मुलिक)


हालांकि प्रतिष्‍ठा के चरमोत्‍कर्ष पर पहुंचने के लिए 57 वर्षीय स्‍टील टायकून को कई विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. गुणवंत सिंह याद करते हैं, ‘‘1984 में सिख विरोधी दंगों में लोग हमारी फैक्‍टरी से सामान लूटकर बेच रहे हैं, लेकिन हम बेबस थे. हमारे परिवार को तीन दिन तक घर में कैद होकर रहना पड़ा. फैक्‍टरी को फिर शुरू करने में बहुत सा पैसा लग गया. ऐसे में हम बड़े कर्ज में डूब गए.’

31 अक्‍टूबर के दिन तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्‍या हुई और सिख विरोधी दंगे भड़के, मोंगिया उसी दिन 22 साल के हुए थे. उस समय वे अपने बजाज स्‍कूटर पर गांव-गांव जाकर लोहे की कीलें बेचा करते थे.

ये कीलें एक छोटी फैक्‍टरी में बनाई जाती थीं, जो गुणवंत सिंह के पिता दलजीत सिंह ने वर्ष 1974 में स्‍थापित की थी. मोंगिया ने 1982 में कॉलेज छोड़कर बिजनेस में कदम रखा. परिवार सिर्फ इस कील फैक्‍टरी की बदौलत बच पाया.

दलजीत सिंह 1946 में अविभाजित पा‍किस्‍तान से पलायन कर आए थे और गिरिडीह में बस गए थे. मोंगिया कहते हैं, ‘‘उन्‍होंने कारपेंटर का काम शुरू किया और वे उन दिनों 2 पैसे कमाने लगे.’’

धीरे-धीरे, दलजीत सिंह समृद्ध हुए तो उन्‍होंने फर्नीचर की दुकान शुरू की. बाद में आरा मशीन डाली. फिर प्‍लाईवुड बिजनेस में आए.

अपने प्रोडक्‍ट के लिए किसी सेलिब्रिटी का खर्च उठाने में असमर्थ मोंगिया ने खुद ही मोंगिया स्‍टील का ब्रांड एंबेसडर बनने की ठानी.


मोंगिया 1982 में जब पुश्‍तैनी कारोबार से जुड़े, तब कील फैक्‍टरी बेहतर चल रही थी. वर्ष 1983 में उन्‍होंने बड़े भाई अमरजीत सिंह के साथ मिलकर रोलिंग मिल शुरू की. वर्ष 1983 में 1.41 एकड़ में 12 लाख रुपए के निवेश से बनी रोलिंग मिल में रोज 3-4 टन सरिया बनता था.

मोंगिया कहते हैं, ‘‘हम बिजनेस का विस्‍तार कर रहे थे कि वर्ष 1984 में दंगे हो गए.’’ रोलिंग मिल के नुकसान ने अधिक समर्पण से फिर शुरुआत करने का साहस दिया.

वर्ष 1988 में कठिन परिश्रम का फल मिला. रोलिंग मिल का बिज़नेस चल पड़ा. रोज 7-8 टन उत्‍पादन होने लगा. उसी साल उन्‍होंने रोलिंग मिल पर ध्‍यान देने के लिए कील फैक्‍टरी बंद कर दी.

गिरिडीह में मोंगिया स्‍टील प्‍लांट में 300 से अधिक लोग काम करते हैं.

वर्ष 1991 में, दलजीत सिंह और दोनों बेटों ने गिरिडीह में ही 2.5 एकड़ में 30 लाख रुपए के निवेश से दूसरी रोलिंग मिल शुरू की. वर्ष 1995 में मोंगिया हाई टेक प्राइवेट लिमिटेड नाम से तीसरी रोलिंग मिल रजिस्‍टर्ड करवाई गई. उन्‍होंने बैंक से 45 लाख रुपए का लोन लेकर 7.5 एकड़ में रोलिंग मिल शुरू की और 1983 में शुरू की गई रोलिंग मिल वर्ष 1997 में बेच दी.

जीवन का बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया, जब वर्ष 2000 में गुणवंत के बड़े भाई अमरजीत सिंह ने कारोबार अलग कर लिया. वे अपनी रोलिंग मिल शुरू करने असम चले गए्.

गुणवंत कहते हैं, ‘‘अब मैं अकेला पड़ गया था. पिता भी ढलती उम्र के चलते आराम करने लगे थे. अब सारे निर्णय मुझे ही करने थे. मैं एक और रोलिंग मिल शुरू करने को लेकर उलझन में था क्‍योंकि यह बिजनेस ठीक नहीं चल रहा था. खराब हालत के चलते मुझे वर्ष 1991 में स्‍थापित दूसरी रोलिंग मिल भी बंद करना पड़ी थी.’’

वर्ष 2001 में उन्‍होंने इस कारोबार से अलग पाइप बनाने के लिए स्ट्रिप मिल शुरू करने का फैसला किया. वे कहते हैं, ‘‘मैंने तीसरी रोलिंग मिल में कुछ बदलाव किए. इस तरह अधिक निवेश की जरूरत नहीं पड़ी और स्ट्रिप मिल शुरू कर दी. इसमें कुछ पैसा भी बना.’’

लेकिन अब भी घाटा अधिक था. जो टर्नओवर वर्ष 2000 में 18 करोड़ था, वह वर्ष 2003 में गिरकर 8 करोड़ रह गया था. इसलिए वर्ष 2003 में उन्‍होंने तय किया कि वे रोलिंग मिल बिजनेस में नई जान डालेंगे. इस तरह वे नई तकनीक टीएमटी सरिया लेकर आए. टीएमटी का मतलब था थर्मो मेकनिकली ट्रीटेड. इन सरियों की बाहरी सतह कठोर, जबकि भीतरी हिस्‍सा मुलायम होता है. ये पारंपरिक सरियों के मुकाबले अधिक मजबूत और टिकाऊ होते हैं.

मोंगिया के पास आज कई लग्‍जरी कारें हैं, लेकिन वे अपनी पहली एयर कंडीशंड मारुति ओमनी कार को नहीं भूल सकते.

वे कहते हैं, ‘‘झारखंड में टीएमटी सरिया सबसे पहले मैं ही लाया. लेकिन लोग इन्‍हें छूते भी नहीं थे. मैं ठेकेदारों और श्रमिकों से मिला. उन्‍हें समझाया कि टीएमटी सरिये आम सरियों से बेहतर हैं. ’’

जल्‍द ही मोंगिया को अहसास हो गया कि टीएमटी सरियों के लिए मांग पैदा करने का एकमात्र जरिया विज्ञापन हैं. वे कहते हैं, ‘‘मेरे पास बॉलीवुड हस्तियों से प्रचार कराने के पैसे नहीं थे. इसलिए मैंने तय किया कि मैं खुद ही ब्रांड एंबेसडर बनूंगा और यह संदेश दूंगा कि यह उत्‍पाद सिखों के बहादुरी जितना मजबूत है. इससे काम बन गया और मैं झारखंड में घर-घर चर्चित हो गया.’’

वर्ष 2003 में मोंगिया स्‍टील लिमिटेड हो गया. वर्तमान में 30 एकड़ के कैंपस में 350 टन सरिया रोज उत्‍पादित होता है. कंपनी में 300 से अधिक कर्मचारी हैं. टीएमटी सरिया के अलावा वे बिलेट्स, पाइप और प्रोफाइल बनाते हैं.

गुणवंत के 32 वर्षीय बेटे हरिंदर सिंह भी कारोबार से जुड़ गए हैं. कंपनी के तीन डायरेक्‍टर हैं- गुणंवत सिंह मोंगिया, उनकी पत्‍नी त्रिलोचल कौर और हरिंदर. हरिंदर के पास भी नई योजना है. वे बताते हैं, ‘‘मैं कंपनी को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहता हूं और विस्‍तार करना चाहता हूं.’’

मोंगिया के बेटे हरिंदर सिंह (खड़े हुए) कारोबार को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के प्रति प्रतिबद्ध हैं.

 

आश्‍चर्यजनक सफलता के बावजूद मोंगिया जमीन से जुड़े हैं. वे अब भी उन दिनों को याद करते हैं जब वे स्‍कूटर पर कीलें बेचा करते थे.

वे कहते हैं, ‘‘जीवन वाकई मुश्किल था. मैं 50 किग्रा वजनी कीलें बजाज स्‍कूटर पर लेकर 250 किमी इलाके में घूमता था और ऑर्डर लिया करता था. कीलों से जख्‍म होते थे, लेकिन सफर नहीं रुकता था.’’

लेकिन तब भी वे उन्‍होंने बड़ा ही सोचा, जैसी उनके पिता सलाह दिया करते थे. आज भी मोंगिया का सफलता का मंत्र है - ‘कभी उम्‍मीद मत छोड़ो. विश्‍वास करो कि आप कर सकते हो.’ 


 

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

  • Vikram Mehta's story

    दूसरों के सपने सच करने का जुनून

    मुंबई के विक्रम मेहता ने कॉलेज के दिनों में दोस्तों की खातिर अपना वजन घटाया. पढ़ाई पूरी कर इवेंट आयोजित करने लगे. अनुभव बढ़ा तो पहले पार्टनरशिप में इवेंट कंपनी खोली. फिर खुद के बलबूते इवेंट कराने लगे. दूसरों के सपने सच करने के महारथी विक्रम अब तक दुनिया के कई देशों और देश के कई शहरों में डेस्टिनेशन वेडिंग करवा चुके हैं. कंपनी का सालाना रेवेन्यू 2 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है.
  • Punjabi girl IT success story

    इस आईटी कंपनी पर कोरोना बेअसर

    पंजाब की मनदीप कौर सिद्धू कोरोनावायरस से डटकर मुकाबला कर रही हैं. उन्‍होंने गांव के लोगों को रोजगार उपलब्‍ध कराने के लिए गांव में ही आईटी कंपनी शुरू की. सालाना टर्नओवर 2 करोड़ रुपए है. कोरोना के बावजूद उन्‍होंने किसी कर्मचारी को नहीं हटाया. बल्कि सबकी सैलरी बढ़ाने का फैसला लिया है.
  • Mandya's organic farmer

    जैविक खेती ही खुशहाली

    मधु चंदन सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में अमेरिका में मोटी सैलरी पा रहे थे. खुद की कंपनी भी शुरू कर चुके थे, लेकिन कर्नाटक के मांड्या जिले में किसानों की आत्महत्याओं ने उन्हें झकझोर दिया और वे देश लौट आए. यहां किसानों को जैविक खेती सिखाने के लिए खुद किसान बन गए. किसानों को जोड़कर सहकारी समिति बनाई और जैविक उत्पाद बेचने के लिए विशाल स्टोर भी खोले. मधु चंदन का संघर्ष बता रहे हैं बिलाल खान
  •  Aravind Arasavilli story

    कंसल्टेंसी में कमाल से करोड़ों की कमाई

    विजयवाड़ा के अरविंद अरासविल्ली अमेरिका में 20 लाख रुपए सालाना वाली नौकरी छोड़कर देश लौट आए. यहां 1 लाख रुपए निवेश कर विदेश में उच्च शिक्षा के लिए जाने वाले छात्रों के लिए कंसल्टेंसी फर्म खोली. 9 साल में वे दो कंपनियों के मालिक बन चुके हैं. दोनों कंपनियों का सालाना टर्नओवर 30 करोड़ रुपए है. 170 लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं. अरविंद ने यह कमाल कैसे किया, बता रही हैं सोफिया दानिश खान
  • Air-O-Water story

    नए भारत के वाटरमैन

    ‘हवा से पानी बनाना’ कोई जादू नहीं, बल्कि हकीकत है. मुंबई के कारोबारी सिद्धार्थ शाह ने 10 साल पहले 15 करोड़ रुपए में अमेरिका से यह महंगी तकनीक हासिल की. अब वे बेहद कम लागत से खुद इसकी मशीन बना रहे हैं. पीने के पानी की कमी से जूझ रहे तटीय इलाकों के लिए यह तकनीक वरदान है.