Milky Mist

Friday, 4 April 2025

500 रुपए से शुरू किया हॉट डॉग का आउटलेट, आज सालाना बिक्री 3.5 करोड़ रुपए

04-Apr-2025 By आकांक्षा दुबे
इंदौर

Posted 17 Dec 2019

महज आठ साल की उम्र में चाय बेचने वाले के रूप में काम की शुरुआत करने से लेकर इंदौर में खानपान का मशहूर आउटलेट खोलने तक विजय सिंह राठौड़ ने जीवन में लंबा सफर तय किया है. इस आउटलेट की बदौलत आज उनकी सालाना बिक्री 3.5 करोड़ रुपए हैं.

विजय सिंह ने इससे अधिक साख अर्जित की है, जो उन्‍होंने इंदौर की प्रसिद्ध 56 दुकान स्‍ट्रीट में सिर्फ 120 वर्ग फीट के आउटलेट से अपने विश्‍वसनीय ग्राहकों को लजीज और गुणवत्‍तापूर्ण फूड परोसकर बनाई है. इसी की बदौलत उनका जीवन प्रेरणादायक कहानी बन गया है.

विजय सिंह राठौड़ ने जॉनी हॉट डॉग की शुरुआत 500 रुपए की पूंजी से की थी. आज उनकी सालाना बिक्री 3.5 करोड़ रुपए है. (सभी फोटो – राकेश)

विजय सिंह अपनी बिजनेस फिलोसॉफी बताते हैं, ‘‘आप जो खाना खिला रहे हैं, उसकी शुद्धता बहुत महत्‍वपूर्ण है. आपको वही खाना परोसना चाहिए, जो आप खुद खा सकते हैं. पैसे बचाने के लिए गुणवत्‍ता से समझौता नहीं किया जा सकता.’’

एक बिजनेसमैन का यह नैतिक विश्‍वास महत्‍वपूर्ण है. विजय सिंह का बिजनेस आइडिया अपने आप में असाधारण था और 1978 में उनके समय से बहुत आगे था.

वर्ष 1978 में जब उन्‍होंने खुद के बूते अपना बिजनेस शुरू करने का निर्णय लिया, तब उनके पास महज 500 रुपए थे, जो एक दशक तक कई जगह काम करके बचाए गए थे. दरअसल उन्‍हें जो भी आइडिया आकर्षक लगता था, उससे प्रभावित हो जाते थे.

अपने साधारण से फूड आइटम का जादुई नाम ‘हॉट डॉग’ रखने के अलावा उन्‍होंने इसके साथ जॉनी नाम भी जोड़ दिया. इस तरह नाम पड़ा ‘जॉनी हॉट डॉग.’ इसमें जॉनी शब्‍द 70 के दशक में आई देव आनंद, हेमा मालिनी और प्राण की मुख्‍य भूमिका वाली मशहूर फिल्‍म ‘जॉनी मेरा नाम’ से लिया गया था. राठौड़ स्‍वीकारते हैं, आउटलेट का नाम तलाशते वक्‍त उनके जेहन में मशहूर जॉनी वॉकर नामक स्‍कॉच व्हिस्‍की का भी ख्‍याल रहा. वे बताते हैं, ‘‘इंदौर में एक मशहूर सिनेमा हॉल था, जहां सिर्फ अंग्रेजी फिल्‍में लगा करती थीं. हमारे पास इतने पैसे नहीं होते थे कि हम फिल्‍म देख सकें, लेकिन काम के बाद वहां इकट्ठे हो जाते थे और वहां मिलने वाले हॉट डॉग का ऑर्डर दिया करते थे.’’

राठौड़ कहते हैं, ‘‘इंदौर में आमतौर पर विजय चाट हाउस या शर्मा स्‍वीट्स जैसे नामों वाली दुकानें हैं. यदि मैं भी अपनी दुकान का नाम राठौड़ हॉट डॉग रखता तो यह नाम लोगों उतना आकर्षित नहीं करता, न ही ग्राहकों का इतना विश्‍वास जीतता.’’

राठौड़ के हॉट डॉग की तर्ज पर पश्चिम में बरसों से ‘लिंक-सॉसेज सैंडविच’ बनाया जाता रहा है, लेकिन आश्‍चर्य की बात है कि उन्‍होंने आज तक उसका स्‍वाद नहीं चखा है.

राठौड़ का मिलनसार स्‍वभाव, स्‍वादिष्‍ट खाना और इसकी कम कीमत के चलते उनके निष्‍ठावान ग्राहकों की संख्‍या बढ़ी है.

हालांकि जॉनी हॉट डॉग पश्चिम के ‘हॉट डॉग’ से एकदम अलग है. जॉनी अपने हॉट डॉग को नर्म गोल पावबन पर बनाते हैं. इसे तवे (बड़ा फ्राइंग पैन) पर टोस्‍ट किया जाता है. इसके भीतर आलू की टिक्‍की या कटलेट भरा जाता है. इसके बाद इसे मसालेदार चटनी और प्‍याज के साथ परोसा जाता है.

विजय सिंह कहते हैं, ‘‘हम देसी घी, ताजे बटर और बन का इस्‍तेमाल करते हैं जो हमारे हॉट डॉग को अनोखा स्‍वाद देते हैं. हॉट डॉग का फायदा यह है कि इसे बनाना आसान है, जबकि कचौड़ी-समोसा बनाने में बहुत मेहनत लगती है. यह एक स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक फूड है. इसे ब्रेकफास्‍ट, लंच या डिनर कभी भी खाया जा सकता है.’’

सबसे अलग बात यह है कि इस गर्मागर्म डिश को हम स्‍टील की प्‍लेट में परोसते हैं. राठौड़ कहते हैं, ‘‘हमने कभी प्‍लास्टिक या दूसरे डिस्‍पोजेबल विकल्‍प पर विचार नहीं किया. शुरू से हम पानी का उपयोग कर रहे हैं और हमने हाइजीन को बनाए रखा है.’’

ग्राहकों द्वारा दादू नाम से पुकारे जाने वाले विजय सिंह एक दिन में 4000 हॉट डॉग बेच लेते हैं. इसमें ऑनलाइन ऑर्डर भी शामिल हैं. वीकेंड के दौरान बिक्री में 400 से 600 पीस का इजाफा होता है. ऐसा तब है जब मीनू में सिर्फ तीन आइटम हैं- वेजीटेबल हॉट डॉग, एग बेंजो और मटन हॉट डॉग.

राठौड़ के एक हॉट डॉग की कीमत 30 रुपए है. इसके बावजूद वे महसूस करते हैं कि इस प्रक्रिया को ऑटोमैटिक करके कीमत को और कम किया जा सकता है. विजय ने बचपन में खुद गरीबी को अनुभव किया है. वे दिन उन्‍हें अब भी अच्‍छे से याद हैं. वे कहते हैं, ‘‘मैं हर बाइट की कीमत समझता हूं.’’

जॉनी हॉट डॉग तीन भिन्‍न रूपों में मिलता है, लेकिन सबकी कीमत एक समान 30 रुपए है.

राठौड़ ने वर्ष 1978 में महज 75 पैसे में एक हॉट डॉग बेचने की शुरुआत की थी. उन दिनों भी वे 50 से 60 हॉट डॉग रोज बेच लेते थे. हालांकि उनके मिलनसार और सौम्‍य स्‍वभाव के चलते आउटलेट की प्रसिद्धि बढ़ रही है.’’ उनका प्रभामंडल ऐसा है कि पहली बार उनके आउटलेट पर आने वाले ग्राहक को भी घर जैसा अनुभव होता है.

उनके सौहार्द का प्रमाण इस बात से मिलता है कि इंदौर के कुछ इंजीनियरों ने अपने कॉलेज के एलुम‍नी गेट टुगेदर में उनका सम्‍मान किया. वे राठौड़ को अपने कॉलेज के दिनों से जानते हैं, जब वे श्री गोविंदराम सेक्‍सरिया इंस्‍टीट़यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी एंड साइंस (एसजीएसआईटीएस) में पढ़ते थे.

राठौड़ उस समय कॉलेज कैंपस के बाहर अपनी दुकान पर काम करते थे. उसी समय उनकी दोस्‍ती इन छात्रों से हुई थी. वे बाद में भी जॉनी हॉट डॉग के आउटलेट आते रहे और विजय के संपर्क में रहे. आगे के वर्षों में वे अपने बच्‍चों और नाती-पोतों के साथ आते रहे. इस तरह यह दोस्‍ती जिंदा रही.

विजय कहते हैं, ‘‘ये छात्र भले ही नामी-गिरामी इंजीनियर और पेशेवर बन गए हों, लेकिन ये मुझसे उसी तरह का प्‍यार और आदर करते हैं, जैसा पहले करते थे. ये आउटलेट पर आकर हॉट डॉग ही नहीं खाते, बल्कि मुझसे मिलते हैं और सदाबहार यादों को ताजा कर देते हैं.’’

एक साल पहले 60 वर्ष के हुए राठौड़ सुबह 4:40 बजे उठ जाते हैं. योग करते हैं और दिनभर की तैयारियां करने के‍ लिए सुबह 7 बजे तक आउटलेट पर पहुंच जाते हैं.

ग्राहक ब्रेकफास्‍ट में हॉट डॉग खाने के लिए सुबह से कतार में लग जाते हैं, भले ही उनके दादू 120 वर्ग फीट की दुकान के एक कोने में कटलेट और बन को तैयार करने में तल्‍लीन रहते हों.

यह आउटलेट एयरकंडीशंड नहीं है, न ही ग्राहकों को लुभाने के लिए यहां टेबल और कुर्सी लगी हैं. राठौड़ के बेटे हेमेंद्र सिंह राठौड़ पिछले सात साल से उनकी मदद कर रहे हैं. वे मुख्‍य रूप से ऑनलाइन डिलीवरी का काम देखते हैं.

हेमेंद्र कहते हैं, ‘‘ऑनलाइन बिक्री से बिजनेस नई ऊंचाई पर पहुंच गया है. हम उम्‍मीद कर रहे हैं कि अगले वित्‍तीय वर्ष तक बिक्री 4 करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगी. दोनों दावा करते हैं कि उन्‍हें अन्‍य बड़े शहरों में विस्‍तार करने के कई ऑफर मिले हैं.’’

जॉनी हॉट डॉग पर राठौड़ शेफ की भूमिका में होते हैं और अपने प्रिय ग्राहकों की भूख मिटाने के लिए रोज सुबह 7 बजे आउटलेट पहुंच जाते हैं.

हालांकि, उन्‍हें अभी तक कोई ‘विश्‍वसनीय और सही साझीदार’ नहीं मिला है. वे सालों की मेहनत से कमाई गई ब्रांड की इज्‍जत को यूं गंवाना नहीं चाहते. उन्‍हें हाल ही में उबर इट्स एपीएसी रेस्‍तरां पार्टनर अवॉर्ड 2019 मिला है.

महज आठ साल की उम्र में काम शुरू करने वाले किसान के बेटे विजय कहते हैं, ‘‘पीछे देखने पर सोचता हूं कि एक तरह से अच्‍छा था कि उन दिनों बालश्रम कानून नहीं थे. उस समय मेरे लिए यह बहुत महत्‍वपूर्ण था कि मैं अपने परिजनों और अपने सात भाई-बहनों की मदद करूं.’’

विजय फूड बिजनेस के प्रति इसलिए आकर्षित हुए क्‍योंकि उनकी मां आजीविका के लिए खाना बनाती थी और उन दिनों बिजली पर निर्भरता के चलते खेती अलाभकारी हो चली थी.

अब उन्‍होंने अपनी उस विपत्ति को अवसर में बदल दिया है. वे खुश हैं कि अपने काम के जरिये वे न केवल कमा पाने में सक्षम हैं, बल्‍कि इससे उन्‍हें वास्‍तवि‍क सम्‍मान, ग्राहकों का संतोष और चिरस्‍थायी संबंध भी मिले हैं.

वे भीख मांगते और शिक्षा से दूर बच्‍चों को देखकर दुखी होते हैं. वे हॉट डॉग की अधिक कीमत वसूलने के भी खिलाफ हैं.

राठौड़ कहते हैं, ‘‘लोग मुझसे पूछते हैं, आप हॉट डॉग की इतनी कम कीमत क्‍यों लेते हैं.’’ मैं हमेशा जवाब देता हूं कि भगवान ने मुझे अपनी योग्‍यता से अधिक दिया है. मैं उनका हमेशा आभारी रहूंगा. लोगों से अधिक पैसा क्‍यों वसूला जाए. आइए भोजन को सबके लिए उपलब्‍ध करवाएं.


 

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

  • Pagariya foods story

    क्वालिटी : नाम ही इनकी पहचान

    नरेश पगारिया का परिवार हमेशा खुदरा या होलसेल कारोबार में ही रहा. उन्होंंने मसालों की मैन्यूफैक्चरिंग शुरू की तो परिवार साथ नहीं था, लेकिन बिजनेस बढ़ने पर सबने नरेश का लोहा माना. महज 5 लाख के निवेश से शुरू बिजनेस ने 2019 में 50 करोड़ का टर्नओवर हासिल किया. अब सपना इसे 100 करोड़ रुपए करना है.
  • success story of two brothers in solar business

    गांवों को रोशन करने वाले सितारे

    कोलकाता के जाजू बंधु पर्यावरण को सहेजने के लिए कुछ करना चाहते थे. जब उन्‍होंने पश्चिम बंगाल और झारखंड के अंधेरे में डूबे गांवों की स्थिति देखी तो सौर ऊर्जा को अपना बिज़नेस बनाने की ठानी. आज कई घर उनकी बदौलत रोशन हैं. यही नहीं, इस काम के जरिये कई ग्रामीण युवाओं को रोज़गार मिला है और कई किसान ऑर्गेनिक फू़ड भी उगाने लगे हैं. गुरविंदर सिंह की कोलकाता से रिपोर्ट.
  • Royal brother's story

    परेशानी से निकला बिजनेस आइडिया

    बेंगलुरु से पुड्‌डुचेरी घूमने गए दो कॉलेज दोस्तों को जब बाइक किराए पर मिलने में परेशानी हुई तो उन्हें इस काम में कारोबारी अवसर दिखा. लौटकर रॉयल ब्रदर्स बाइक रेंटल सर्विस लॉन्च की. शुरुआत में उन्हें लोन और लाइसेंस के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा, लेकिन मेहनत रंग लाई. अब तीन दोस्तों के इस स्टार्ट-अप का सालाना टर्नओवर 7.5 करोड़ रुपए है. रेंटल सर्विस 6 राज्यों के 25 शहरों में उपलब्ध है. बता रहे हैं गुरविंदर सिंह
  • Bharatpur Amar Singh story

    इनके लिए पेड़ पर उगते हैं ‘पैसे’

    साल 1995 की एक सुबह अमर सिंह का ध्यान सड़क पर गिरे अख़बार के टुकड़े पर गया. इसमें एक लेख में आंवले का ज़िक्र था. आज आंवले की खेती कर अमर सिंह साल के 26 लाख रुपए तक कमा रहे हैं. राजस्थान के भरतपुर से पढ़िए खेती से विमुख हो चुके किसान के खेती की ओर लौटने की प्रेरणादायी कहानी.
  • Anjali Agrawal's story

    कोटा सिल्क की जादूगर

    गुरुग्राम की अंजलि अग्रवाल ने राजस्थान के कोटा तक सीमित रहे कोटा डोरिया सिल्क को न केवल वैश्विक पहचान दिलाई, बल्कि इसके बुनकरों को भी काम देकर उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ की. आज वे घर से ही केडीएस कंपनी को 1,500 रिसेलर्स के नेटवर्क के जरिए चला रही हैं. उनके देश-दुनिया में 1 लाख से अधिक ग्राहक हैं. 25 हजार रुपए के निवेश से शुरू हुई कंपनी का टर्नओवर अब 4 करोड़ रुपए सालाना है. बता रही हैं उषा प्रसाद