Friday, 5 March 2021

इस युवा ने स्टोरेज रूम में शुरू की कंपनी, सात साल में टर्नओवर पहुंचाया 18 करोड़ रुपए

05-Mar-2021 By गुरविंदर सिंह
बेंगलुरु

Posted 01 Sep 2018

बंगाल के एक छोटे से गांव के निवासी सुमन हलदर हमेशा से कुछ बड़ा करना चाहते थे. वो अपने सपनों पर भरोसा करते थे. अपनी मध्‍यमवर्गीय पृ‍ष्‍ठभूमि और सामान्‍य स्‍कूल में पढ़ाई के बावजूद 37 वर्षीय इस युवा ने साबित कर दिखाया है कि यदि कोई व्‍यक्ति अपना लक्ष्‍य तय कर ले तो कोई बाधा उसके रास्‍ते में नहीं आ सकती.

अपनी धारणा को साबित करने के लिए सुमन के पास कुछ नहीं था और वो ख़ुद भी कुछ नहीं थे. लेकिन उन्‍होंने अपने दृढ़ निश्‍चय के बलबूते यह कर दिखाया और शीर्ष पर जा पहुंचे.

सुमन हलदर ने बेंगलुरु में चार कर्मचारियों के साथ 50 वर्गफुट जगह में बनाए गए ऑफिस से फोइवे की शुरुआत की थी. आज, वो 400 लोगों को रोज़गार दिया है. कंपनी के कोलकाता और रूस में भी ऑफिस हैं. (सभी फ़ोटो – विशेष व्‍यवस्‍था से)

सुमन ने अपनी आईटी सर्विसज़ मैनेजमेंट फर्म फोइवे (Fusion of Intelligence with Excellence) इन्‍फो ग्‍लोबल सॉल्‍यूशंस एलएलपी की शुरुआत बेंगलुरु में 50 वर्गफुट जगह से वर्ष 2010 में की थी. तब उनके पास मात्र तीन पुराने कंप्‍यूटर, एक राउटर, एक सेल फ़ोन और कुछ फर्नीचर था.

उन्‍होंने अपनी बचत से 60,000 रुपए बिज़नेस में लगाए और चार लोगों के साथ गंदे से स्‍टोरेज रूम से की.

सुमन हंसते हुए कहते हैं, ‘‘ऑफिस के लिए जगह लेने में समर्थ नहीं था. मैंने स्‍टोरेज रूम किराए पर ले लिया क्‍योंकि कोई भी उसे लेने के लिए इच्‍छुक नहीं था.’’

आज, फ़ोइवे बेंगलुरु की सीमाओं से आगे निकल चुकी है. कंपनी के कोलकाता के साथ-साथ रूस में भी ऑफिस हैं और इनमें 400 लोग काम करते हैं. वर्ष 2017-18 में कंपनी का टर्नओवर 18 करोड़ रुपए रहा.

फ़ोइवे ने आईटी सर्विसेज़ मैनेजमेंट, कंटेंट मॉडरेशन और कस्‍टमर सपोर्ट के तौर पर शुरुआत की थी.

सुमन कहते हैं, ‘‘हम प्रतिष्ठित ब्रैंड की वेबसाइट पर यूज़र द्वारा पोस्‍ट किए गए संदेशों को टेक्‍स्‍ट, इमेज, वीडियो, रिव्‍यूज़ और फ़ीडबैक के रूप में मोडिफाई करते हैं.’’

वो कहते हैं, ‘‘जब यूज़र द्वारा जनरेट कंटेंट निपुणता से नियंत्रित किया जाता है, तो आपकी ऑनलाइन मौजूदगी अधिक विश्‍वसनीय हो जाती है. कंटेंट मॉडरेशन का हमारा काम दिन-रात लगातार चलता रहता है और हम यह सुनिश्चित करते हैं कि जब भी यूज़र किसी ब्रैंड की वेबसाइट पर जाए तो उसे उपयुक्‍त कंटेंट मिले.’’

साल 2010 को याद करते हुए सुमन कहते हैं, ‘‘उस वक्‍त पैसे की बहुत तंगी थी. हमें ऑफिस का किराया 800 रुपए चुकाने में भी परेशानी आ रही थी.’’

सुमन की यात्रा कितनी अपवादों से भरी रही है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि वो अब दुनियाभर में फैले ऑफिसों का किराया ही क़रीब 1.5 करोड़ रुपए सालाना चुकाते हैं.

10 अगस्‍त 1981 को जन्‍मे सुमन बंगाल के चौबीस परगना जिले के बिस्‍वनाथपुर गांव के रहने वाले हैं. यह गांव कोलकाता से क़रीब 40 किमी दूर है. दो बच्‍चों में वो सबसे बड़े हैं. दोनों मध्‍यमवर्गीय परिवार में पले-बढ़े.

उनके पिता एक किसान थे, जबकि मां गृहिणी थीं.

सुमन कहते हैं, ‘‘हमारे पास जीवनयापन लायक़ ही कमाई होती थी...इसके बावजूद मेरे पिता हमारी पढ़ाई के लिए कुछ बचत कर लेते थे.’’

बेंगलुरु में अपने कुछ कर्मचारियों के साथ सुमन.

उन्‍होंने अपनी स्‍कूली शिक्षा 1998 में बैरकपुर के भोलानंदा नैशनल विद्यालय से पूरी की और बेंगलुरु चले गए, जहां होटल मैनेजमेंट कोर्स के तीन वर्षीय कोर्स के लिए केपीएचआर इंस्‍टीट्यूट में दाखिला ले लिया. उन्‍होंने साथ-साथ विभिन्‍न कंप्‍यूटर कोर्स भी किए.

सुमन कहते हैं, ‘‘तंगी के बावजूद पिता ने मेरे लिए बहुत कुछ किया. उद्ममी बनने के अपने सपने के बावजूद मैं उन पर और अधिक बोझ नहीं बनना चाहता था. इसलिए स्‍नातक की डिग्री के बाद तत्‍काल बाद नौकरी करने लगा.’’

साल 2001 में उन्‍होंने तकनीकी सलाहकार के तौर पर आईटीसी इन्‍फ़ोटेक ज्‍वॉइन की, जहां उनकी मासिक तनख्‍़वाह 7,500 रुपए थी.

सुमन के मुताबिक, ‘‘मैं नौकरी और पढ़ाई साथ-साथ कर रहा था.’’ उन्‍होंने इवनिंग क्‍लास के जरिये साल 2003 में बेंगलुरु के एएमसी कॉलेज से एमबीए किया और बाद में रायपुर की महात्‍मा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी से एमसीए की डिग्री ली.

उन्‍होंने वर्ष 2010 तक आईबीएम और यूनिसिस जैसी कंपनियों में काम किया.

सुमन कहते हैं, ‘‘साल 2010 में आखिर मुझे अहसास हुआ कि खुद की कंपनी खोलने का सपना साकार करने का यही सही वक्त है. मैं न केवल कुछ बड़ा करना चाहता था, बल्कि मैं समाज को वापस लौटाने को लेकर भी प्रेरित था- दरअसल, मैं लोगों को नौकरी देना चाहता था.’’

जुलाई 2010 में, सुमन ने फ़ोइवे इन्‍फ़ो ग्‍लोबल सॉल्‍यूशंस एलएलपी का रजिस्‍ट्रेशन करवाया और गंदे से स्‍टोर रूप में काम शुरू कर दिया, जो उनका पहला ऑफिस बना. शुरुआती दिनों में कंटेंट मॉडरेशन की मांग अधिक नहीं थी, क्‍योंकि लोगों को इसकी ज़रूरत महसूस नहीं होती थी. इस तरह सुमन को अच्‍छी शुरुआत करने में थोड़ा वक्‍त लगा.

सुमन की योजना अपना बिज़नेस अमेरिका और यूरोप तक विस्‍तार करने की है.

सुमन बताते हैं, ‘‘ऐसा भी समय रहा, जब मैंने परिवार के जेवरात बेचकर पैसे जुटाए, क्‍योंकि मुझे तनख्‍़वाह और मासिक बिलों के लिए पैसों की आवश्‍यकता होती थी. संतुष्टि की बात सिर्फ़ यह थी कि मेरा परिवार मेरे साथ चट्टान की तरह अडिग रहा.’’

तमाम अवरोधों के बावजूद पहले साल का टर्नओवर 2.9 लाख रुपए रहा.

सुमन की कंपनी वर्तमान में लेवल 1 की कोर कंटेंट मैनेजमेंट कंपनी हैं. अब वे अमेरिका और यूरोप में अपने बिज़नेस को विस्‍तार देने की योजना बना रहे हैं.

सुमन की प्रेरणादायी उद्ममी यात्रा साबित करती है कि आप कहां से आए हैं, यह मायने नहीं रखता. महत्‍वपूर्ण यह है कि आप कहां जा रहे हैं.


Milky Mist
 

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

  • Success story of a mumbai restaurant owner

    सचिन भी इनके रेस्तरां की पाव-भाजी के दीवाने

    वो महज 13 साल की उम्र में 30 रुपए लेकर मुंबई आए थे. एक ऑफ़िस कैंटीन में वेटर की नौकरी से शुरुआत की और अपनी मेहनत के बलबूते आज प्रतिष्ठित शाकाहारी रेस्तरां के मालिक हैं, जिसका सालाना कारोबार इस साल 20 करोड़ रुपए का आंकड़ा छू चुका है. संघर्ष और सपनों की कहानी पढ़िए देवेन लाड के शब्दों में
  • Bharatpur Amar Singh story

    इनके लिए पेड़ पर उगते हैं ‘पैसे’

    साल 1995 की एक सुबह अमर सिंह का ध्यान सड़क पर गिरे अख़बार के टुकड़े पर गया. इसमें एक लेख में आंवले का ज़िक्र था. आज आंवले की खेती कर अमर सिंह साल के 26 लाख रुपए तक कमा रहे हैं. राजस्थान के भरतपुर से पढ़िए खेती से विमुख हो चुके किसान के खेती की ओर लौटने की प्रेरणादायी कहानी.
  • Astha Jha story

    शादियां कराना इनके बाएं हाथ का काम

    आस्था झा ने जबसे होश संभाला, उनके मन में खुद का बिजनेस करने का सपना था. पटना में देखा गया यह सपना अनजाने शहर बेंगलुरु में साकार हुआ. महज 4000 रुपए की पहली बर्थडे पार्टी से शुरू हुई उनकी इवेंट मैनेटमेंट कंपनी पांच साल में 300 शादियां करवा चुकी हैं. कंपनी के ऑफिस कई बड़े शहरों में हैं. बता रहे हैं गुरविंदर सिंह
  • Success Story of Gunwant Singh Mongia

    टीएमटी सरियों का बादशाह

    मोंगिया स्टील लिमिटेड के मालिक गुणवंत सिंह की जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उनका सिर्फ एक ही फलसफा रहा-‘कभी उम्मीद मत छोड़ो. विश्वास करो कि आप कर सकते हो.’ इसी सोच के बलबूते उन्‍होंने अपनी कंपनी का टर्नओवर 350 करोड़ रुपए तक पहुंचा दिया है.
  • Abhishek Nath's story

    टॉयलेट-कम-कैफे मैन

    अभिषेक नाथ असफलताओं से घबराने वालों में से नहीं हैं. उन्होंने कई काम किए, लेकिन कोई भी उनके मन मुताबिक नहीं था. आखिर उन्हें गोवा की यात्रा के दौरान लू कैफे का आइडिया आया और उनकी जिंदगी बदल गई. करीब ढाई साल में ही इनकी संख्या 450 हो गई है और टर्नओवर 18 करोड़ रुपए पहुंच गया. अभिषेक की सफर अब भी जारी है. बता रहे हैं गुरविंदर सिंह