Milky Mist

Sunday, 1 August 2021

जिन्होंने उडिपी का मशहूर डोसा उत्तर भारत तक पहुंचाया

01-Aug-2021 By Bilal Handoo
New Delhi

Posted 27 Dec 2017

जयराम बानन को 60 के दशक के मध्य का वो दिन याद है, जब वो उडिपी (कर्नाटक) के अपने घर से भाग गए थे. 64 साल की उम्र में आज उन्हें निर्विवाद रूप सेउत्तर भारत का डोसा किंगकहा जाता है.


एक वक्त था जब वो मुंबई में 18 रुपए महीने कमाने के लिए एक कैंटीन में बर्तन धोया करते थे.


आज उनकीसागर रत्नारेस्तरां चेन की सालाना कमाई क़रीब 70 करोड़ रुपए है.

https://www.theweekendleader.com/admin/upload/27-05-17-08may27-17-bananlead1.JPG

जयराम बानन समूह के चेयरमैन जयराम बानन रेस्तरांओं की चेन, स्टार-श्रेणी की होटलों, बजट होटलों और फै़क्ट्रियों में कैंटीन के मालिक हैं.


सात भाई-बहनों में से एक जयराम बताते हैं कि उनके पिता क्रूर व्यक्ति थे. वो एक ड्राइवर थे और स्कूल में ख़राब प्रदर्शन पर अपने बेटे की आंखों में पिसी मिर्च डाल देते थे.
 

13 वर्ष की उम्र में जब जयराम एक बार परीक्षा में फेल हो गए तो अपने पिता के बटुए से पैसे चुराकर घर से मुंबई भाग गए.
मुंबई जाने वाली बस में उडिपी के ही एक व्यक्ति ने उन्हें रोते हुए देखा और अपने साथ नवी मुंबई के पनवेल में हिंदुस्तान ऑर्गेनिक केमिकल्स (एचओसी) की कैंटीन ले गया.

 

कैंटीन में उन्हें बर्तन धोने की 18 रुपए महीने की पहली नौकरी मिली. उन दिनों उडुपी से कई लोग जीवनयापन के लिए मुंबई जाया करते थे.
 

आज बेहद मशहूर सागर रत्ना, स्वागत और श्रमन रेस्तरां चेन के मालिक जयराम याद करते हैं, “ये लोग मुंबई में डोसा लेकर आए. उन्होंने इस शहर का मसाला डोसा से परिचय करवाया और इसे भारत की नंबर वन डिश बना दिया.”
 

यह जयराम की मेहनत और ईमानदार काम का ही नतीजा था कि जल्द ही उन्हें बर्तन साफ़ करने के काम से वेटर, हेडवेटर और फिर मैनेजर तक पदोन्नत कर दिया गया.
 

जयराम ने एचओसी में आठ साल काम किया. महीने के 200 रुपए कमाने वाले जयराम ने इस दौरान काम और प्रबंधन के कई गुर सीखे.
 

एचओसी में बिताया गया वक्त मुश्किल था, लेकिन इसने जयराम के भीतर अपना काम शुरू करने की भावना पैदा की.
 

शुरुआत में उन्होंने मुंबई में ही दक्षिण भारतीय होटल खोलने का विचार किया, लेकिन मुंबई में पहले से बहुत सारे दक्षिण भारतीय होटल थे.
 

इस कारण उन्होंने इस विचार को त्याग दिया.
 

एचओसी में नौकरी छोड़कर 1973 में वो दिल्ली गए. दिल्ली में उनका भाई एक उडिपी रेस्तरां में मैनेजर था.
 

दिल्ली आने के बाद ही उन्होंने प्रेमा से विवाह कर लिया.
 

यह ऐसा वक्त था जब सरकार दिल्ली के नज़दीक गाजियाबाद में सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (सीईएल) की स्थापना कर रही थी.
 

1974 में जयराम को सीईएल मेंमात्र 2000 रुपए के निवेश में कैंटीन खोलने का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया.

https://www.theweekendleader.com/admin/upload/27-05-17-08may27-17-bananvert.JPG

बनान सागर रत्ना चेन समेत उत्तर भारत में 90 रेस्तरां के मालिक हैं.


इस कैंटीन को खोलने का फ़ैसला उनके जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ. उन्होंने तीन रसोइयों की मदद से कैंटीन में अच्छी क्वालिटी का खाना परोसना शुरू किया.


नतीजा यह हुआ कि कैंटीन में आने वाले लोगों को उनका खाना पसंद आने लगा और खाना हिट हो गया.
 

शुरुआती दिनों को मुस्कुराहट के साथ याद कर जयराम कहते हैं, ”मुझे ऐसा ही प्रोत्साहन चाहिए था, जिससे मैं किसी बड़े और ख़ूबसूरत काम की ओर क़दम बढ़ा सकूं.”
 

वो स्पष्ट करते हैं, “उन दिनों दिल्ली में उडिपी खाने के नाम पर लोगों को हल्दीराम का डोसा ही मिल पाता था. वह बहुत मशहूर था, आसानी से मिल जाता था, लेकिन असली डोसा नहीं था.”


दरअसल असली दक्षिण भारतीय डोसा सिर्फ़ दो महंगे रेस्तरां में ही मिलता था: लोधी होटल के वुडलैंड्स और एंबैसडर के दसप्रकास में.”
जयराम को मौक़ा नज़र आया और उन्होंने एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई. उन्होंने वुडलैंड्स जैसी इडली और डोसा गली की चाट के दामों में बेचना शुरू किया!

https://www.theweekendleader.com/admin/upload/27-05-17-09may27-17-banandosa.jpg

बनान गली की चाट के दामों पर क्वालिटी डोसा ग्राहकों को देने लगे.


 

चार दिसंबर 1986 को उन्होंने दिल्ली की डिफ़ेंस कॉलोनी मार्केट में बचत के 5000 रुपए से अपना पहला रेस्तरां खोला.
 

चालीस सीटों वाले होटल का नाम उन्होंनेसागररखा. इस रेस्तरां में उन्होंने इडली, डोसा और सांभर जैसी दक्षिण भारतीय डिश परोसना शुरू की.
 

पहले ही दिन 408 रुपए की बिक्री हुई. लेकिन हर हफ़्ते का किराया 3250 रुपए था, यानी उन्हें शुरुआत में आर्थिक घाटा हुआ, लेकिन उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि वो खाने की गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं करेंगे.


जयराम हर दिन सुबह सात बजे से आधी रात तक बिना रुके काम करते थे. इसका नतीजा यह हुआ कि रेस्तरां की बिक्री बढ़ने लगी।
वो कहते हैं, “मुझे लगता है कि खाने की अच्छी क्वालिटी, सस्ता खाना और अच्छी सेवा से लोगों कोसागरपसंद आने लगा.”

 

जल्द ही बढ़ती मांग के चलते जयराम को रेस्तरां के ऊपर की जगह भी किराए पर लेनी पड़ी.
 

लेकिनसागरकी बढ़ती लोकप्रियता के कारण यह जगह भी कम पड़ने लगी और लोग रेस्तरां के बाहर लंबी क़तारों में खड़े होकर इंतज़ार करने लगे.


चार साल बाद 1991 में जयराम ने वुडलैंड्स को ख़रीद लिया, वही रेस्तरां जिससे कभी उन्होंने मुकाबला किया था।
 

बनान कहते हैं, “उडिपी जैसे छोटे शहर से आए मेरे जैसे लड़के के लिए यह एक बड़ा क़दम था. डिफ़ेंस कॉलोनी में जहां रेस्तरां थोड़ा खाली दिखता था, मैंने वुडलैंड्स को फ़ैंसी लुक देने का फ़ैसला किया.”

 

https://www.theweekendleader.com/admin/upload/27-05-17-08may27-17-bananrest.JPG

बनान के रेस्तरां का एक नज़ारा.


जयराम गर्व से याद करते हैं, “मैंने फ़र्नीचर पर 50,000 रुपए ख़र्च किए, खाने का दाम 20 प्रतिशत बढ़ा दिया और रेस्तरां को सागर रत्ना नाम दिया.”


सागर रत्नाब्रांड ने तेज़ी से क़दम बढ़ाए और जल्द ही शहर में 35 ‘सागर रत्नाहो गए.
 

आम लोगों से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनीतिज्ञसागर रत्नाआने लगे.
 

वर्ष 1999 में उन्होंने लुधियाना के होटल महाराजा रिजेंसी में पहला फ्रैंचाइज़ी आउटलेट खोला.
 

उन्होंनेसागर रत्नाफ्रैंचाइज़ी के लिए कम से कम 60 लाख रुपए के न्यूनतम निवेश की सीमा रखी.
 

अगले 15 सालों में चंडीगढ़, मेरठ, गुड़गांव और दूसरे भारतीय शहरों मेंसागर रत्नाके 36 फ्रैंचाइज़ी खुल गए.


वक्त गुज़रा औरसागर रत्नाने अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर में भी रेस्तरां खोले.
 

सागर रत्नाके इतने बड़े ब्रांड बनने के बावजूद जयराम ने कोस्टल फ़ूड में दख़ल देने की सोची.
 

“उडिपी तटीय शहर है. मैंने सोचा कि दिल्ली के लोगों को दक्षिण भारत के कोस्टल फ़ूड से परिचित किया जाए.”
 

इस तरह डिफ़ेंस कॉलोनी मेंसागर रत्नासे थोड़ी ही दूर पहलास्वागतरेस्तरां खुला.
 

ऐसा खाना दिल्ली में मुश्किल से ही मिलता था. इस कारण जल्द ही भारतीय और विदेशी बड़ी संख्या में यहां आने लगे.
 

आजस्वागतके 17 रेस्तरां मौजूद हैं. यहां मैंगलुरु, चेट्टिनाड और मलाबार इलाक़े का स्वादिष्ट कोस्टल फूड मिलता है.
 

वर्ष 2005 में मशहूर मिएल गाइड नेस्वागतको एशिया के सबसे बेहतरीन सीफ़ूड रेस्तरां में से एक घोषित किया.

जयराम बनान आज उत्तर भारत में 90 रेस्तरां के मालिक हैं.
 

हर रेस्तरां चेन को प्रति वर्ष 20.25 प्रतिशत मुनाफ़ा होता है.

https://www.theweekendleader.com/admin/upload/27-05-17-08may27-17-banancu.JPG

लौटाना - उडुपी के करकला में सागर रत्ना रेस्तरां बनान के माता-पिता की स्मृति में शुरू किया गया। यहां 10 रुपए में पूरा खाना खिलाया जाता है.
वर्ष 2000 मेंसागर रत्नाकी कुल बिक्री 12 करोड़ की थी, जो 2005 में बढ़कर 25 करोड़ हो गई.

आजसागर रत्नाका कुल मूल्य क़रीबग 200 करोड़ रुपए है.
 

अगस्त 2011 में उन्हें न्यूयॉर्क की निजी इक्विटी फ़र्म इंडिया इक्विटी पार्टनर्स (आईईपी) सेसागर रत्नाके लिए निवेश हासिल करने में कामयाबी मिली.
 

आईईपी ने 180 करोड़ मेंसागर रत्नाका 75 प्रतिशत हिस्सा ख़रीद लिया और एक नया सीईओ नियुक्त किया.
 

जयराम ने अपना 22.7 प्रतिशत हिस्सा बरकरार रखा और वोसागर रत्नाचेन के चेयरमैन बन गए.
 

चेन का नाम अब जयराम बनान ग्रुप (जेआरबी) रखा गया.
 

इस कूटनीतिक क़दम का मकसदसागर रत्नाब्रांड का विस्तार करना और इसे ऐसी रेस्तरां चेन बनाना था जिसकी शाखाएं पूरे भारत में हों.
 

हालांकि अक्टूबर 2013 तक जयराम आईपी के बीच मतभेद गहरे हो गए और जयराम ने अपने शेयर वापस ख़रीद लिए.
 

अब तक उनका बेटा रोशन कारोबार में शामिल हो चुका था.
 

जेआरबी समूह ने अब दूसरे संबद्ध व्यापारों में क़दम बढ़ाने के बारे में सोचा.

आज समूह स्टार-श्रेणी के होटल, बजट होटल, फ़ैक्ट्रियों में कैंटीन, बेकरी आदि का मालिक है. इसके अलावा यह पैकेज़्ड स्नैक्स, अचार और तैयार खाना भी बेचता है.
 

लेकिन कुछ और नया करने की भूख जयराम में ख़त्म नहीं हुई है.
 

हाल ही में उन्होंनेश्रमननाम से नई रेस्तरां चेन की शुरुआत की.
 

यहां उत्तर भारत के मारवाड़ी और जैन परिवारों में खाए जाना वाला बेहतरीन और लज़ीज़ खाना मिलता है.
 

यहां परोसा जाने वाला खाना बिना लहसुन और प्याज़ के पकाया जाता है.
 

वो कहते हैं, “बाज़ार में मांग के मुताबिक हमें लगातार बदलाव करने पड़ते हैं और अभी तक हम इसी तरह आगे बढ़ते रहे हैं.”

https://www.theweekendleader.com/admin/upload/27-05-17-08may27-17-bananrest1.JPG

बनान ने विभिन्न कारोबारों में क़रीब 10,000 लोगों को रोजगार दिया है.

2010 में उडिपी के करकला में खोले गएसागर रत्नारेस्तरां में 10 रुपए में पूरा खाना मिलता है.
 

यह रेस्तरां उन्होंने अपने माता-पिता की स्मृति में खोला था.
 

वो कहते हैं, “हमें हमेशा समाज को वापस देना चाहिए. इसी से ज़िंदगी में बढ़ोतरी होती है.”


कई कारणों में से यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि उनके रेस्तरां में काम करने वाले क़रीब सभी 10,000 लोग कर्नाटक और तमिलनाडु के रहने वाले हैं.
 

आज भी जब कोई ग्राहक उनके रेस्तरां में प्रवेश करता है तो वो झुककर उसका स्वागत करते हैं. उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आने वाला ग्राहक आम आदमी है या फिर कोई सेलिब्रिटी.
 

शायद यही कारण है कि आज डिफ़ेंस कॉलोनी स्थितसागर रत्नारेस्तरां में रोज़ 2,000 से ज़्यादा लोग खाना खाने आते हैं.

 

 


Milky Mist
 

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

  • Dairy startup of Santosh Sharma in Jamshedpur

    ये कर रहे कलाम साहब के सपने को सच

    पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से प्रेरणा लेकर संतोष शर्मा ने ऊंचे वेतन वाली नौकरी छोड़ी और नक्सल प्रभावित इलाके़ में एक डेयरी फ़ार्म की शुरुआत की ताकि जनजातीय युवाओं को रोजगार मिल सके. जमशेदपुर से गुरविंदर सिंह मिलवा रहे हैं दो करोड़ रुपए के टर्नओवर करने वाले डेयरी फ़ार्म के मालिक से.
  • ‘It is never too late to organize your life, make  it purpose driven, and aim for success’

    द वीकेंड लीडर अब हिंदी में

    सकारात्मक सोच से आप ज़िंदगी में हर चीज़ बेहतर तरीक़े से कर सकते हैं. इस फलसफ़े को अपना लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ने वाले देशभर के लोगों की कहानियां आप ‘वीकेंड लीडर’ के ज़रिये अब तक अंग्रेज़ी में पढ़ रहे थे. अब हिंदी में भी इन्हें पढ़िए, सबक़ लीजिए और आगे बढ़िए.
  • how Chayaa Nanjappa created nectar fresh

    मधुमक्खी की सीख बनी बिज़नेस मंत्र

    छाया नांजप्पा को एक होटल में काम करते हुए मीठा सा आइडिया आया. उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. आज उनकी कंपनी नेक्टर फ्रेश का शहद और जैम बड़े-बड़े होटलों में उपलब्ध है. प्रीति नागराज की रिपोर्ट.
  • malay debnath story

    यह युवा बना रंक से राजा

    पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव का युवक जब अपनी किस्मत आजमाने दिल्ली के लिए निकला तो मां ने हाथ में महज 100 रुपए थमाए थे. मलय देबनाथ का संघर्ष, परिश्रम और संकल्प रंग लाया. आज वह देबनाथ कैटरर्स एंड डेकोरेटर्स का मालिक है. इसका सालाना टर्नओवर 6 करोड़ रुपए है. इसी बिजनेस से उन्होंने देशभर में 200 करोड़ रुपए की संपत्ति बनाई है. बता रहे हैं गुरविंदर सिंह
  • Pagariya foods story

    क्वालिटी : नाम ही इनकी पहचान

    नरेश पगारिया का परिवार हमेशा खुदरा या होलसेल कारोबार में ही रहा. उन्होंंने मसालों की मैन्यूफैक्चरिंग शुरू की तो परिवार साथ नहीं था, लेकिन बिजनेस बढ़ने पर सबने नरेश का लोहा माना. महज 5 लाख के निवेश से शुरू बिजनेस ने 2019 में 50 करोड़ का टर्नओवर हासिल किया. अब सपना इसे 100 करोड़ रुपए करना है.