Milky Mist

Thursday, 3 April 2025

चेन्नई में पराठा बेचने वाला बना 18 करोड़ की रेस्तरां चेन का मालिक

03-Apr-2025 By पीसी विनोज कुमार
चेन्नई

Posted 14 Jul 2018

अपने पिता के पराठे बेचने के ठेले पर काम करने पर एक बच्‍चे को स्‍कूल में छींटाकशी का शिकार होना पड़ता था, लेकिन उसने अपना जीवन बदलने के लिए कड़ी मेहनत की. आज वह एक रेस्‍तरां चेन का मालिक है, जिसका महज दो साल में सालाना टर्नओवर 18 करोड़ रुपए पहुंच गया है.

सड़क किनारे खाना बनाने से लेकर ग्रैंड कैमन आइलैंड के फ़ाइव स्टार होटल में शेफ़ बनने और फिर चेन्नई लौटकर रेस्तरां चेन शुरू करने तक सुरेश चिन्‍नासामी ने अद्भुत सफर तय किया है. सुरेश की संघर्ष गाथा किसी भी ऐसे व्‍यक्ति को प्रेरित कर सकती है, जो विषम परिस्थितियों से निकलकर जिंदगी बदलना चाहता है.

1980 के दौर में सुरेश चिन्‍नासामी के पिता मरीना और बसंत नगर बीच पर भोजन का ठेला लगाते थे. सुरेश कठिन परिस्थितियों से जूझे और अब वे एक रेस्‍तरां चेन के मालिक हैं. (सभी फ़ोटो : रवि कुमार)


सुरेश की उम्र 37 साल है और आज भी सकारात्मक ऊर्जा से लबालब हैं.

बचपन के दिनों को याद करते हुए सैमीज़ डोसाकाल के संस्‍थापक सुरेश कहते हैं, मेरे पिता ने साल 1979 में बसंत नगर में एक ठेले से खाने की दुकान की शुरुआत की. फिर उन्होंने मरीना बीच पर ठेला लगाना शुरू किया. साल 1987 में अड्यार में एक छोटी सी जगह किराए पर ली और मटन व चिकन ग्रेवी के साथ लंच बेचना शुरू किया.

अड्यार में उनकी दुकान पर निर्माण कार्य में ढेर सारे मज़दूर खाना खाने आते थे और इस तरह उनका काम बढ़ने लगा.

सुरेश बताते हैं, जब मैं 12 साल का था, तभी से पिता की मदद करने लगा था. मुझसे तीन साल बड़ा मेरा भाई और मैं खाना बनाते और बर्तन धोते थे.

उन दिनों सुरेश ऑलकॉट मेमोरियल स्कूल में पढ़ते थे, जहां उन्हें मुफ़्त शिक्षा और दोपहर का खाना मिलता था.

जब परिवार एक और दुकान खोलने के लिहाज से डिंडीगुल स्थानांतरित हुआ, तब उनकी उम्र 13 साल थी और उन्होंने स्कूल जाना बंद कर दिया था. उनके पिता गांव पेरियाकोट्टाई में खेती करने लगे, साथ ही उन्होंने नज़दीकी नगर पलानी में छोटी सी दुकान खोल ली.

सुरेश अपने पिता के साथ दुकान में काम करते, तो बड़ा भाई गांव में फ़सल की देखभाल करता और स्कूल जाता. हालांकि खेती से ख़ास आमदनी नहीं हुई, तो दो साल बाद परिवार ने चेन्‍नई लौटने का फ़ैसला किया.

चेन्नई में उन्होंने ईस्ट कोस्ट रोड के श्रीनिवासपुरम में एक जगह किराए पर ली और भोजन के बिज़नेस को आगे बढ़ाया.

जब सुरेश ने पिता की दुकान से 100 मीटर आगे इडली, डोसा  और पूड़ी बेचने के लिए अलग ठेला लगाने का इरादा किया, तब उनकी उम्र मात्र 15 साल थी.

सुरेश बताते हैं, जल्द ही मेरे ठेले की बिक्री पिताजी की दुकान की बिक्री से ज़्यादा होने लगी. वो अगर दिन के 200 रुपए कमाते तो मेरी बिक्री 250 रुपए होती. मैं लोगों को दिन का खाना भी बेचने लगा और जल्द ही हमने एक और ठेला लगाना शुरू कर दिया. मेरी मां उस ठेले का ध्यान रखतीं और हमने पहली बार लोगों को काम पर रखना शुरू किया.

सुरेश ने कार्निवाल क्रूज़ लाइनर और ग्रैंड कैमन आइलैंड स्थित होटल रिट्ज़ कार्लटन में बतौर शेफ़ काम किया.


एक दिन उनकी दुकान में एक वृद्ध ग्राहक आया और उन्होंने सुरेश को कक्षा 10 की परीक्षा में प्राइवेट परीक्षार्थी के तौर पर बैठने का सुझाव दिया. इस सुझाव ने उनकी ज़िंदगी बदल दी.

काम से लौटने के बाद रात 11 से 1 बजे तक वो पढ़ाई करते. उन्होंने 37 प्रतिशत अंकों से परीक्षा पास की और बसंत नगर में अरिग्नार अन्ना गवर्नमेंट हायर सेकंडरी स्कूल में प्रवेश लिया, जहां कक्षा 12 तक पढ़ाई की.

स्कूल छूटने के बाद अपने ठेले पर काम में जुटने वाले सुरेश बताते हैं, साथी मुझे पराठा बनाने वाला कहकर बुलाते, लेकिन मुझे कभी इस बात का न बुरा लगा, न ही अपने काम पर शर्म आई. इससे मुझे ज़्यादा मेहनत से काम करने की प्रेरणा मिलती ताकि मैं परिवार की मदद कर सकूं.

कक्षा 12 पास करने के बाद उन्होंने साल 1997 में बीए कॉर्पोरेट सेक्रेटरीशिप इवनिंग कोर्स ज्वाइन कर लिया. अगले साल मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा के लिए दाखिला लिया.

सुरेश बताते हैं, उस वक्त तक हम बिज़नेस से ठीकठाक पैसा कमाने लगे थे. हालांकि मुझे अहसास हुआ कि अगले स्तर तक पहुंचने के लिए पढ़ाई पर ध्यान देना होगा.

मैं सुबह से दोपहर तीन बजे तक कैटरिंग की क्लास अटैंड करता. उसके बाद तजुर्बे के लिए होटल सवेरा के किचन में काम करता.

डोसाकाल में मामूली दाम पर विभिन्‍न तरह के नॉन-वेजीटेरियन व्‍यंजन परोसे जाते हैं.


बाद में उन्होंने अलगप्पा विश्वविद्यालय से मार्केटिंग में एमबीए किया.

साल 2001 में, सुरेश ने क्रूज़ शिप में बतौर कुक नौकरी करने का फ़ैसला किया और चेन्नई की इंडस हॉस्पिटैलिटी करियर्स ऐंड ट्रेनिंग में एक महीने का कोर्स किया.

अगले साल उन्होंने मुंबई में इंटरव्‍यू दिया और दुनिया के सबसे बड़े क्रूज़ शिप में से एक कार्निवाल क्रूज लाइन में सपनों की नौकरी हासिल कर ली.

जब उन्‍होंने अपना हूनर दिखाने के लिए मियामी जाना पड़ा, तो परिवार ने एक लाख रुपए इकट्ठा किए. इस वक्त तक परिवार पर तीन लाख रुपए कर्ज़ चढ़ चुका था, लेकिन सुरेश ने कुछ ही समय में यह कर्ज़ चुकता कर दिया.

वो बताते हैं, मैंने जहाज़ पर 500 अमेरिकी डॉलर की तनख्‍़वाह पर असिस्टेंट कुक के तौर पर काम किया. साथ ही हाउसकीपिंग में पार्ट टाइम नौकरी की जिसके लिए 600 डॉलर अलग से मिलते. मैं कमरे, टॉयलेट साफ़ करता और बिस्तर ठीक करता.

हाल ही में वाडापलानी में आउटलेट शुरू करने वाले सुरेश कहते हैं, हर साल मुझे प्रमोशन मिलता और पांचवें साल जब मैंने जहाज़ छोड़ा, तब मैं शेफ़ बन चुका था और महीने के 2,000 डॉलर कमाने लगा था, जिसमें टिप शामिल थी.

कार्निवाल के बाद वो कैरिबियन स्थित ग्रैंड कैमन आइलैंड चले गए, वहां एक जमैकावासी को एक बार और रेस्तरां स्‍थापित करके दिया. सात महीने बाद वो आइलैंड की बड़ी होटल रिट्ज़ कार्लटन से जुड़ गए.

सुरेश बताते हैं, मैंने साल 2013 तक कार्लटन में काम किया. इस दौरान मासिक कमाई चार से पांच लाख रुपए महीना हो गई थी. मैं अपनी पत्नी दिव्या को भी यहां ले आया, जिसने स्पा में बतौर को-ऑर्डिनेटर काम किया और तीन लाख रुपए प्रति महीना कमाने लगी.

सुरेश ने साल 2008 में दिव्या से शादी की थी और उसी साल उन्होंने उनकी जहाज़ में नौकरी दिलवा दी.

कुकिंग के प्रति सुरेश का शौक अब भी बरकरार है. जब भी वो अपने रेस्‍तरां में होते हैं, हाथ ज़रूर आज़माते हैं.


दिव्या और सुरेश दोनों साल 2013 में चेन्नई लौट आए. तब तक उन्होंने अच्छे-ख़ासे पैसे जमा कर लिए थे. उन्होंने चेन्नई में एक रेस्तरां चेन में शेफ़ के तौर पर दो साल काम किया और फिर साल 2016 में 1.8 करोड़ रुपए के निवेश से पेरांबूर के स्पेक्ट्रम मॉल में 10,000 वर्ग फ़ीट जगह पर खुद के रेस्तरां की शुरुआत की.

इस रेस्तरां की सफ़लता के बाद उन्होंने अगले कुछ महीनों में पांच नए रेस्तरां खोले.

सुरेश कहते हैं, मैं किसी काम में अपना पैसा निवेश करता हूं और मुनाफ़े को नए काम में लगा देता हूं. जब तंगी होती है तो निजी निवेशकों से पैसे उठाता हूं और मुनाफ़े से उसे चुका देता हूँ.

वो कहते हैं, साल 2017-18 में हमारा टर्नओवर 18 करोड़ रुपए रहा. मेरे होटल मुनाफ़े में चल रहे हैं. मैं हर महीने 25 प्रतिशत मुनाफ़ा कर्मचारियों के साथ बांटता हूं. इससे सब खुश हो जाते हैं और मुनाफ़ा कमाने में एक क़दम आगे बढ़ाने के लिए हमेशा तैयार रहते  हैं.

सुरेश ने अपनी कंपनी को रजिस्टर करवा लिया है और उनकी कंपनी में क़रीब 400 कर्मचारी काम करते हैं.

डोसाकाल के वाडापलानी स्थित आउटलेट का सामने का दृश्‍य.


उनके रेस्तरां के मांसाहारी भोजन ने काफ़ी नाम कमाया है. बिज़नेस को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने नई स्कीम की शुरुआत की है.

उनके भाई अमेरिका में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं. जबकि माता-पिता सेंट्रलाइज़ किचन संभालते हैं और हफ़्ते में कम से कम तीन बार वहां ज़रूर जाते हैं.


 

आप इन्हें भी पसंद करेंगे

  • The rich farmer

    विलास की विकास यात्रा

    महाराष्ट्र के नासिक के किसान विलास शिंदे की कहानी देश की किसानों के असल संघर्ष को बयां करती है. नई तकनीकें अपनाकर और बिचौलियों को हटाकर वे फल-सब्जियां उगाने में सह्याद्री फार्म्स के रूप में बड़े उत्पादक बन चुके हैं. आज उनसे 10,000 किसान जुड़े हैं, जिनके पास करीब 25,000 एकड़ जमीन है. वे रोज 1,000 टन फल और सब्जियां पैदा करते हैं. विलास की विकास यात्रा के बारे में बता रहे हैं बिलाल खान
  • Namarata Rupani's story

    डॉक्टर भी, फोटोग्राफर भी

    क्या कभी डाॅक्टर जैसे गंभीर पेशे वाला व्यक्ति सफल फोटोग्राफर भी हो सकता है? हैदराबाद की नम्रता रुपाणी इस अटकल को सही साबित करती हैं. उन्हाेंने दंत चिकित्सक के रूप में अपना करियर शुरू किया था, लेकिन एक बार तबियत खराब होने के बाद वे शौकिया तौर पर फोटोग्राफी करने लगीं. आज वे दोनों पेशों के बीच संतुलन बनाते हुए 65 लाख रुपए सालाना कमा लेती हैं. बता रहे हैं गुरविंदर सिंह...
  • Selling used cars he became rich

    यूज़्ड कारों के जादूगर

    जिस उम्र में आप और हम करियर बनाने के बारे में सोच रहे होते हैं, जतिन आहूजा ने पुरानी कार को नया बनाया और बेचकर लाखों रुपए कमाए. 32 साल की उम्र में जतिन 250 करोड़ रुपए की कंपनी के मालिक हैं. नई दिल्ली से सोफ़िया दानिश खान की रिपोर्ट.
  • IIM topper success story

    आईआईएम टॉपर बना किसानों का रखवाला

    पटना में जी सिंह मिला रहे हैं आईआईएम टॉपर कौशलेंद्र से, जिन्होंने किसानों के साथ काम किया और पांच करोड़ के सब्ज़ी के कारोबार में धाक जमाई.
  • Success story of man who sold saris in streets and became crorepati

    ममता बनर्जी भी इनकी साड़ियों की मुरीद

    बीरेन कुमार बसक अपने कंधों पर गट्ठर उठाए कोलकाता की गलियों में घर-घर जाकर साड़ियां बेचा करते थे. आज वो साड़ियों के सफल कारोबारी हैं, उनके ग्राहकों की सूची में कई बड़ी हस्तियां भी हैं और उनका सालाना कारोबार 50 करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर चुका है. जी सिंह के शब्दों में पढ़िए इनकी सफलता की कहानी.